उत्तर – जो भक्ति करता है, वह ‘भक्त’ है और जो भक्तिभाव चैतन्य में रहता है वह सच्चा भक्त यानी ‘श्रद्धावान’ है।

उत्तर – स्वयंभगवान ही एकमात्र वास्तविक कर्ता है। क्योंकि इस विश्‍व की प्रत्येक बात चाहे किसी भी प्रकार से घटित होती हो, कोई भी अपनी कर्मस्वतंत्रता का इस्तेमाल किसी भी तरह से करता हो, अंतत: सारे सूत्र इस स्वयंभगवान के ही हाथों में रहते हैं। सभी सूत्रों को सुव्यवस्थित रूप से संचालित करता रहता है और इसी लिए इसे ‘सूत्रात्मा’ यह भी नाम है।

उत्तर – भक्तिभाव चैतन्य में रहने के कारण उद्धरण का मार्ग खुला हो जाता है और थोड़ी प्रतीक्षा के बाद भक्त पापमुक्त हो जाता है। यानी भक्तिभाव चैतन्य में रहने के कारण ‘कर्म के अटल सिद्धान्त’ का प्रभाव नष्ट होने में मदद मिलती है।
पाप का पापत्व और पुण्य का पुण्यत्व इन दोनों बातों से वह स्वयंभगवान अलिप्त होता है। यह स्वयंभगवान केवल भक्तिभाव चैतन्य में ही लिप्त हो जाता है। स्वयंभगवान श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के ९वें अध्याय के ३० वें श्‍लोक में सुस्पष्ट रूप से कहा है – ‘यदि कोई अत्यन्त दुराचारी मेरा अनन्यभाव के साथ भजन करता है, तो उसने बहुत अच्छे से भक्ति का निश्‍चय किया है इस कारण से उसे पवित्र ही मानना चाहिए।’
सद्गुरु वह स्वयंभगवान स्वयं एक ही एक है और शुभात्रेयी द्वारा किया गया उसका मन्त्रगजर ऐसे सुदुराचारियों को अर्थात् जो अत्यन्त एवं सर्वथा दुराचारी हैं, जिन्होंने पापों की अन्तिम मर्यादा को लाँघ दिया है, जिन्होंने कोई भी पाप करने का बाकी नहीं रखा है ऐसे मूढ़ों को भी भक्तिभाव चैतन्य में प्रवेश करने पर पापहीन कर देता है।

उत्तर – मानव का मन भले ही भगवत्-परायण बन जाये, परन्तु जब तक उसे शरीर का साथ नहीं मिलता, तब तक मन निश्‍चल नहीं बन सकता और चंचल मन निरंतर भगवत्-परायण नहीं रह सकता; और इसीलिए जहाँ कहीं भी मन चंचल एवं दुर्बल बन सकता है, वहाँ पर इस प्रकार की उपासनाएँ शरीर और बुद्धि को मन से बाँधकर रखती हैं। पूजन आदि सभी बाह्य उपचार यह मानव के प्राणमय देह में स्थित ऊर्जाकेंद्रों को समर्थ एवं शुद्ध बनाने के विभिन्न मार्ग हैं।

जब तक देह है, तब तक श्रद्धावान को भजन, पूजन, अर्चन, हवन, तीर्थयात्रा, व्रत आदि  बाह्य-उपचारों की आवश्यकता है ही।

उत्तर – ‘मैं’ भगवान में हूँ, मैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे हृदय में है, भगवान के प्रेम में ही मैं सुख से जी सकता हूँ, यह शाश्‍वत सत्य जब मानव भूल जाता है और भगवान का आधार केवल आवश्यकता के लिए ही लेता रहता है, तब उस मानव की स्थिति समुद्र से अलग पड़ चुकी एक बूँद की तरह हो जाती है – वह बूँद अर्थात् जीवात्मा अर्थात् वह मानव यत्किंचित् अर्थात् अल्प बन जाता है और कुछ न कर सकते हुए ज़मीन में घुसकर कीचड़ बन जाता है।

समुद्र से अलग पड़ चुकी बूँद जब सूर्य की उष्मा से भाप बनकर आकाश में जाती है और पर्जन्य (बारिश) की बूँद बनकर पुन: सागर में आ मिलती है, तब ‘उस बूँद को’ संपूर्ण सागर का सामर्थ्य प्राप्त होता है अर्थात् उस बूँद को अब समूचे समुद्र का समर्थन मिलता है।

उसी प्रकार मानव जब हमेशा इस बात का एहसास रखता है कि ‘मैं उस अनंत एवं अथाह ऐसे स्वयंभगवान का अंश हूँ,’ तब उसे उस भगवत्-समुद्र से सभी बातों की आपूर्ति की जाती है।

‘मैं भगवान का अंश हूँ’ यानी मैं भगवान से अलग नहीं हुआ हूँ, इस सच को जीवन में उतारने का सर्वश्रेष्ठ और अत्यधिक सरल, आसान मार्ग है भक्तिभाव चैतन्य।

उत्तर – समुद्र और समुद्र की एक बूँद इनके बीच का रिश्ता यही स्वयंभगवान और प्रत्येक मानव इनके बीच का रिश्ता है।

रासायनिक दृष्टि से समुद्र का जल और उस जल की अलग हुई एक बूँद इनके बीच में कोई भी फर्क नहीं है – अर्थात् अभेद है। परन्तु समूचे समुद्र का सामर्थ्य और उस अलग पड़ चुकी बूँद का सामर्थ्य इनके बीच में तुलना नहीं हो सकती।

उत्तर – स्वयंभगवान त्रिविक्रम का मंत्रगजर मानव सुख में हो तब भी, मुश्किल में या दुख में हो तब भी; और उसी प्रकार सुख या दुख दोनों के न होते हुए भी अर्थात् कुछ विशेष घटित न हो रहा हो तब?भी; यानी किसी भी परिस्थिति में कर सकता है।

उत्तर – इस सार्वभौम मंत्रगजर का प्रथमार्ध है, श्रद्धावान के द्वारा भगवान त्रिविक्रम और त्रि-नाथों से की गयी प्रार्थना और इस सार्वभौम मंत्रगजर का द्वितीयार्ध है, भगवान त्रिविक्रम से श्रद्धावानों के लिए आनेवाली कृपा का स्रोत अर्थात् प्रसाद। यह मंत्रगजर सार्वभौम है। क्योंकि यह एकमात्र अद्वितीय ऐसा परिपूर्ण मंत्र है। जहाँ से इस मंत्र का आरंभ होता है, वहीं पर आकर यह ठहर जाता है – अर्थात् वर्तुल पूरा हो जाता है।

उत्तर – स्वयंभगवान त्रिविक्रम का नाम-मंत्रगजर, त्रिविक्रम की रूपसुंदरता, त्रिविक्रम की लीलाएँ और त्रिविक्रम का मूल धाम (अर्थात् त्रि-नाथों का अनाकलनीय पवित्र अस्तित्व) इनके प्रति प्रेम रहने से ही कोई भी भक्त अपने आप स्वयंभगवान त्रिविक्रम के प्रेम का अनुभव कर सकता है।

उत्तर – किसी भी ज्ञान का चिन्तन करने से शान्ति प्राप्त नहीं होती। शान्ति और सुख प्राप्त होता है, केवल और केवल भक्तिभाव चैतन्य में रहने से।

भगवान के उपदेश का चिन्तन करते हुए यदि भगवान का चिन्तन और नामस्मरण नहीं किया, अर्थात् भगवत्-वाक्यों का चिन्तन यदि भक्तिभाव चैतन्य-विरहित हो, तो वह उपयोगी नहीं हो सकता। भगवान के प्रेम के बिना सब कुछ व्यर्थ होता है।

उत्तर – भगवान त्रिविक्रम अपने भक्तों को कृतघ्नता का पाप न लग जाये इसके लिए उनसे आभार अथवा उपहार का स्वीकार नहीं करता।

त्रिविक्रम केवल, किसी के द्वारा उसका आभार माना जायें, यह नहीं चाहता; क्योंकि फिर नियम के अनुसार उस भक्त के पास आभार के बदले में उतना पुण्य आता है और श्रद्धावान आभार मानना भूल जाये तो उतना पाप आ सकता है

और इस प्रकार से पाप अपने भक्तों के पास जाये यह बात त्रिविक्रम को कभी भी रास नहीं आयेगी।

अत एव त्रिविक्रम को जो देना हो, अर्पण करना हो, वह केवल प्रेम एवं श्रद्धा के साथ करो, मानी हुई मन्नत पूरी करने के लिए भी करो; परन्तु आभार मानने (Thanks) के रूप में नहीं बल्कि केवल प्रेम से।

श्रद्धावान त्रिविक्रम को प्रेम से सब कुछ देता रहे। केवल उसका आभार न मानकर उसके स्थान पर ‘मैं तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ’ यह कहता रहे।

क्योंकि प्रेम, श्रद्धा, भक्ति, निष्ठा और विश्‍वास ये ही पंच-उपचार त्रिविक्रम को सबसे प्रिय हैं।

उत्तर – स्वयंभगवान त्रिविक्रम श्रद्धावानों के जीवन में सदैव तीन स्तरों पर एक ही समय कार्यरत रहता है और तरल स्तर पर वह ‘आकाश’ महाभूत के माध्यम से ‘शब्द’ अर्थात् ‘विचार’ इस मार्ग से कार्यशील रहता है;

वहीं, सूक्ष्म स्तर पर यह त्रिविक्रम ‘वायु’ महाभूत के माध्यम से ‘स्पर्श’ अर्थात् ‘प्रेरणा’ इस मार्ग से कार्यरत रहता है;

इसी तरह स्थूल स्तर पर यह त्रिविक्रम ‘अग्नि’ महाभूत के माध्यम से ‘तेज’ अर्थात् ‘कार्य-उत्साह, कार्यशक्ति और कृतिसामर्थ्य’ मार्ग से कार्य करता है।

उत्तर – जब जब श्रद्धावान विरुद्ध (बनाम) श्रद्धाहीन ऐसी परिस्थिति होती है, तब तब श्रीत्रिविक्रम केवल श्रद्धावानों की ही सहायता करता है।

परन्तु जब श्रद्धाहीनों के बीच आपस में ही अन्तर्गत संघर्ष शुरू होता है, तब यही श्रीत्रिविक्रम उनमें से जो गुट केवल अज्ञानवश श्रद्धाहीन बन गया है, उसके पीछे खड़ा रहता है और पहले उन्हें श्रद्धावान बनाकर फिर उन्हें विजयी बनाता है।

इस तरह श्रीत्रिविक्रम केवल श्रद्धावानों को ही विजयी बनाता है और अत एव उसे ‘श्रद्धावानों का कैवारी’ कहा जाता है।

उत्तर – त्रिविक्रम के दर्शन से किसी भी भक्त को पहले प्राप्त होती है, मन:शांति। किसी को सौ प्रतिशत मन:शांति प्राप्त होगी, किसी का मन पचास प्रतिशत ही शांत होगा। परन्तु त्रिविक्रम की तसवीर के भी दर्शन के बाद मन थोड़ा सा भी शांत नहीं हुआ, ऐसा कभी भी नहीं होता है और ना ही होगा।

उत्तर – सभी सच्चे श्रद्धावानों के पाप का अर्थात् हालाहल विष (ज़हर) का प्राशन करना, यह त्रिविक्रम का प्रमुख कार्य है और इसी कारण एकमात्र यह ऐसा है कि जिसके चरण पूर्ण विश्‍वास से पकड़नेवाले, देखनेवाले और उनका (उन चरणों का) स्मरण करनेवाले सच्चे श्रद्धावान के हर एक पाप को यह केवल छोटी सी गलती में परिवर्तित करता रहता है।

उत्तर – ‘अंबज्ञता’ यानी आदिमाता के प्रति श्रद्धावान के मन में होनेवाली और कभी भी ढल न सकनेवाली असीम कृतज्ञता।

उत्तर – ‘नाथसंविध्’ का अर्थ है, जगदंबा दुर्गा के द्वारा पूर्वजन्मों से अलग ऐसी इस नये जन्म के लिए बनायी गयी विशेष योजना।

नाथसंविध् अर्थात् यह जन्मयोजना अर्थात् इन तीन नाथबिंदुओं की इच्छा, प्रेम, करुणा, क्षमा और सामर्थ्य सहायता इन पंचविशेषों के द्वारा बनायी गयी संपूर्ण जीवन की रूपरेखा।

मानव इस रूपरेखा के अनुसार ही अपना जीवन व्यतीत करे इस उद्देश्य से वह एकमात्र भगवान त्रिविक्रम, मानव की श्रद्धा बलवान हो इसके लिए और उसके सद्गुणों का विकास करने के लिए निरंतर कार्य करता रहता है।

परन्तु इस रूपरेखा को मानव की कर्मस्वतंत्रता के आड़े नहीं आने दिया जाता। इस रूपरेखा का स्वीकार करने के लिए अथवा उसे नकारने के लिए मानव स्वतंत्र होता है। 

परन्तु यह नाथसंविध् रूपरेखा ही मानव के लिए सबसे श्रेयस्कर (परमहितकारी) होती है।

उत्तर – ॐ यह एकाक्षर मंत्र (एक अक्षरवाला मंत्र) जिस तरह त्रि-नाथों के सामर्थ्य से युक्त है, वह विश्‍व के प्राकट्य का मूल बीज है,

उसी तरह ‘राम’-नाम यह त्रि-नाथों का एकत्रित अस्तित्व धारण करनेवाला सर्वश्रेष्ठ मंत्र है। इसमें स्थित ‘रं’ का अर्थ है अग्नि अर्थात् सहजशिव, ‘आ’ अर्थात् मूल दैवी प्रकाश अर्थात् सच्चिदानंद, ‘आ’नंदबीज और ‘म’ यह आदिमाता का बीज (षोमबीज) है।

इसी कारण राम इस नाम का महाविष्णु के द्वारा अभिमान धारण कर रामजन्म होनेवाला है, फिर भी ‘राम’ नाम संपूर्ण त्रि-नाथ कुल के सभी बीजमंत्रों को अपने उदर में धारण करता है।

दत्तगुरु और इसी कारण सहजशिव और जगदंबा को ‘राम’ यह नाम सबसे ज्यादा प्रिय है।

राम नाम में ‘रा’ रूप से सहजशिव का सामर्थ्य अर्थात् पितृत्व-सामर्थ्य और ‘म’ रूप से जगदंबा का सामर्थ्य अर्थात् मातृत्व-सामर्थ्य हर एक के लिए, हर एक श्रद्धावान के लिए उसे आवश्यक उतने प्रमाण में रहता है।

इस राम नाम का वहन स्वयं हनुमानजी करते हैं और इसी रामनाम के शरीर को त्रिविक्रम धारण करता है।

उत्तर – सच्चिदानंद अर्थात् सत्, चित्, आनंद स्वरूप परमेश्‍वर दत्तगुरु, आदिपिता सहजशिव नारायण और आदिमाता जगदंबा नारायणी इन त्रिनाथों (Hyperlink) का समूचे विश्‍व को व्याप्त करने वाला और भक्तों के जीवन में सर्वत्र भरकर रहने वाला ‘जीवित आनंद’ ही है स्वयंभगवान, अर्थात् त्रिविक्रम यानी त्रि-नाथों का आनंद।

त्रिविक्रम और स्वयंभगवान ये दो शब्द एकरूप ही हैं।

उत्तर – प्रजापतिब्रह्मा, महाविष्णु और परमशिव ये तीनों रूप ये सहजशिव और जगदंबा के तीन पुत्र ही हैं और यह तुम भी जानते ही हो।

साथ ही इन तीनों के रूप और कार्य अलग होने के बावजूद भी इन तीनों का मूल रूप ॐकारस्वरूप परमात्मा यही है।

हर एक मनुष्य को उसके गत जन्मों के अनुभवों के अनुसार और कर्मों के अनुसार अगले जन्म में पसंद, नापसंद और चयन करना ये तीन बातें हर एक क्षेत्र के लिए अपने आप ही प्राप्त हो जाती हैं। इसी कारण किसी को कोई एक देवता पसंद होगा, वहीं किसी दूसरे को कोई दूसरा देवता अच्छा लगेगा और इस चण्डिकाकुल के सदस्यों के कई रूप जनमानस में दृढ हैं और उन सभी रूपों का प्रतिनिधित्व और केंद्रीकरण महाविष्णु और परमशिव तथा लक्ष्मी और पार्वती इनमें होता है।

क्योंकि इन दोनों की की गयी उपासना त्रि-नाथों तक ही जाकर पहुँचती है।

महाविष्णु के भक्तों की उपासना का स्वीकार महाविष्णु का ही रूप लेकर, परन्तु सहस्रबाहु धारण करके ‘नारायण’ इस नाम से सहजशिव करता है और जगदंबा ‘नारायणी’ रूप से करती है,

वहीं, परमशिव की उपासना का स्वीकार सहजशिव ‘महादेव’ इस नाम से और ‘सहस्रहस्त शिव’ के रूप में करता है और जगदंबा ‘शिवा’ और ‘महादेवी’ इन नामों से इसका स्वीकार करती है।

इन त्रि-नाथों की योजना के कारण अर्थात् नाथसंविध् के कारण भगवान के किसी भी रूप को माननेवाला भक्त त्रि-नाथों के आशीर्वाद से वंचित नहीं रह सकता।

उत्तर – परब्रह्म परमेश्‍वर दत्तगुरु के ‘एकोऽस्मि बहुस्याम्’ इस आद्य स्फुरण से यानी इच्छा से यह विश्‍व उत्पन्न हुआ और उनके इस संकल्प के साथ ही वे परमेश्‍वर स्वयं ही ‘श्रीमन्नारायण’ अर्थात् ‘श्रीमहादुर्गेश्‍वर’ बन गये और उनकी इच्छा ही आदिमाता गायत्री, जगदंबा, चण्डिका बन गयी। लीलाधारी परमेश्‍वर स्वयं की लीला से ही इस विश्‍व की उत्पत्ति करते हैं, स्व-लीला से ही वे इस विश्‍व का संचालन करते हैं और अपनी लीला से ही वे इस विश्‍व का स्वयं में लय करते हैं।

परमेश्‍वर दत्तगुरु की इस लीलाशक्ति को ही ‘ललिता’ कहा जाता है। आदिमाता जगदंबा ललिता ही परमेश्‍वर की आद्यलीला है, प्रथमलीला है। यही इन परमपिता दत्तगुरु की,  नित्यशिव की नित्यलीला है। यही इन महाकामेश्‍वर की आद्य कामना है।

ललिता ही आदिविद्या, शुद्धविद्या, पराशक्ती, चण्डिका, महादुर्गा, श्रीविद्या है। परमेश्‍वर ‘श्रीमन्नारायण’ है, तो परमेश्‍वरी ‘नारायणी’ है; परमेश्‍वर ‘महादुर्गेश्‍वर’ है, तो ये ‘महादुर्गा’ है;  परमेश्‍वर ‘महाकामेश्‍वर’ है, तो यह ललिता ‘महाकामेश्‍वरी कामकला’ है।

उत्तर – दत्तगुरु, सहजशिव महादुर्गेश्‍वर और जगदंबा दुर्गा इन तीनों की ही और तीनों की एकत्रित रूप से ‘नाथ’ यह संज्ञा है। दत्तगुरु अर्थात् निर्गुण अर्थात् निरंजननाथ, सहजशिव महादुर्गेश्‍वर अर्थात् आदिनाथ अर्थात् सगुणनाथ और जगदंबा दुर्गा अर्थात् उदयनाथ अर्थात् सकलनाथ।

इन तीनों को ही ‘नाथ’ अर्थात् ‘परमेश्‍वर’ कहा जाता है।

‘नाथ’ इस नाम में ‘न’ यह निरंजननाथ का वाचक है, ‘आ’ यह सगुणनाथ का वाचक है और ‘थ’ यह सकलनाथ का वाचक है।

उत्तर – रोगों को निमंत्रण देनेवाला और परमेश्‍वरी कृपा के लिए अवरोध बननेवाला यह क्रोध यानी मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। भस्मासुर ने जिस तरह अपने ही मस्तक पर हाथ रखकर स्वयं को ही जला दिया, उसी तरह हम अपने ही क्रोध पर मन में ग़ुस्सा कर लेंगे तब ही जाकर यह क्रोधरूपी भस्मासुर नष्ट होगा। परन्तु इस भस्मासुर से यह सब कुछ करवाने वाली वह ‘मोहिनी’ यानी क्या? महाविष्णु का वह मोहिनी अवतार ही परमात्मा की ‘सगुण भक्ति’ है। परमेश्‍वर की नामरूपी मोहिनी जितने प्रमाण में मेरे अंतरंग में प्रवेश करती है, उसके प्रत्येक पदन्यास के साथ मेरे भीतर के षडरिपु उतने ही प्रमाण में नष्ट होते हैं और उतनेही प्रमाण में परमेश्‍वर के षडैश्वर्य मेरे जीवन में प्रवेश करते हैं।

उत्तर – काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मत्सर ये षडरिपु ही प्रत्येक मनुष्य के पूर्णता के स्वप्न को साकार न होने देने वाले छह शत्रु हैं।

क्रोध के कारण मनुष्य अपना आपा खो बैठता है। और फिर कई बार केवल एक क्रोध के आवेश में आकर की गई ग़लती का प्रायश्‍चित्त करने में संपूर्ण लौकिक जीवन बरबाद हो जाता है।

मुझे क्रोध आते रहता है, किसी न किसी कारणवश, ऐसा हम सभी को लगता है; इतना ही नहीं, बल्कि ऐसा हमें पूरा विश्‍वास होता है। परन्तु क्रोध मेरे मन में रहता है, बढ़ते ही रहता है। होता ऐसा है कि अपने लिए अनुकूल ऐसे किसी विशेष कारण से अवसर पाते ही वह उबलकर बाहर आ जाता है। ग़लत विचार, ग़लत आहार-विहार और ग़लत अपेक्षाओं के कारण ही मन में स्थित क्रोध पनपते रहता है और मज़बूत होते जाता है।

क्रोध यह सबसे अधिक प्रभावकारक और पल भर में विनाश कर देने वाला भस्मासुर ही है।

अन्याय के प्रति तिलमिला उठना यह ज़िन्दादिली का लक्षण हैं। परन्तु छोटे-छोटे कारणों से मन ही मन में या ज़ाहिर रूप से ग़ुस्से से पेश आना यह मेरे स्वयं के लिए ही अधिक हानिकारक होता है। मेरे अत्यधिक नाराज़ हो जाने के कारण और नाराज़गी कम करने का प्रयत्न न करने के कारण शरीर की अनेक रासायनिक क्रियाओं पर उसका दुष्परिणाम होता है और वह बहुत समय तक स्थिर रहता है। उच्च रक्तचाप (High Blood Pressure), जठरव्रण (Peptic Ulcer), अम्लपित्त (Acidity), हृदयविकार (Heart Disease),  संधिगतवात (Arthritis), दमा (Bronchial Asthama) इत्यादि अनेक रोग क्रोध को बढ़ावा देने से ही बढ़ते हैं, यही बात आधुनिक वैद्यकशास्त्र भी हमसे कहता है। क्रोध के कारण महाप्राण का मन पर रहनेवाला नियंत्रण भी क्षीण हो जाता है। अर्थात् मेरे मन पर रहने वाला परमेश्वरी अंकुश इस क्रोध के कारण ढीला पड़ जाता है। अर्थात् क्रोध मेरे भक्तिमार्ग के प्रवास में भी बाधा डालता है।

उत्तर – प्रत्येक मानव के अन्तर्मन में सभी प्रकार के बीज होते ही हैं। अच्छे एवं बुरे, शुद्ध एवं अशुद्ध ऐसे दोनों प्रकार के बीज एक साथ निवास करते हैं। उनमें से कौन सा बीज कब उगेगा और बढ़ने लगेगा यह हमारे प्रारब्ध पर निर्भर करता है,

परन्तु उगे हुए कौन से पौधे को बढ़ने देना है और कौन से पौधे को जड़-मूल के साथ नष्ट हो जाने तक काटते रहना है, यह मेरे हाथ में होता है। इसी को ‘कर्मस्वतन्त्रता’ कहते हैं।

उत्तर – प्रत्येक जीवात्मा का पुरुषार्थ इसीमें है कि मृत्यु का भय तथा मरने की अगतिकता पूर्ण रूप से नष्ट हो जानी चाहिए। जीवन को सफल बनाना हो, तो मुझे मेरे जीवन में तृप्ति, शांति और सन्तोष लाना आवश्यक है।

उत्तर – सन्मार्ग पर चलते हुए व्यवहार करते रहना और इसी तरह व्यवहार करते करते अंतर्मन को धीरे-धीरे परमेश्वरी मन के प्रवेश के लिए खाली करते रहना ही अध्यात्म है; (और जीवन में अध्यात्म इस अंतिम ध्येय को साकार करने के लिए देहोपयोगी क्रिया सन्मार्ग से चलाना ही व्यवहार है)।
वहीं, अपने जीवन का प्रत्येक कार्य हम परमेश्वर के लिए कर रहे हैं और परमेश्वर को हमारी सभी बातें उसी क्षण ज्ञात हो जाती हैं, इस बात को ध्यान में रखकर जीना ही आध्यात्मिक जीवन है और यही मार्ग दर असल संतुष्टि, शान्ति एवं नित्यप्रसन्नता देनेवाला होता है।
सत्य, प्रेम, आनंद यही एकमात्र अध्यात्म की त्रिसूत्री है। वहीं भक्ति, सेवा एवं संस्कारों का शुद्धीकरण यही अध्यात्म के साधन हैं। व्यावहारिक जीवन जीते समय ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम अधिक सन्मार्ग से करना अर्थात् धर्म से अर्थ और काम इन पुरुषार्थों की प्राप्ति करना, यही आध्यात्मिक जीवन की पहली सफल सीढ़ी है और इस तरह गृहस्थी करते हुए सेवा और भक्ति का अवलंबन करके स्वयं का अधिक शुद्धीकरण करके बदलाव लाना यह अध्यात्मवाद की दूसरी सफल सीढ़ी है।

उत्तर – परमेश्वर के प्रति रहने वाली मेरी भक्ति जितने प्रमाण में मेरे अन्तर्मन पर अधिकार रखती है, उसी प्रमाण में मेरे अन्तर्मन में छिपा हुआ अनेक प्रकार का डर धीरे धीरे दूर होते रहता है।

यही है भक्ति का फल।

उत्तर – प्रारब्ध अर्थात् ‘मन’ और इस मन को बदलने का अर्थ है प्रारब्ध को बदलना।

और यह बदलने की क्रिया ही अंधकार का रूपान्तरण प्रकाश में करने की क्रिया है।

मेरे मन की कमज़ोरी का ही रूपान्तरण मेरे मन के सामर्थ्य में करने की क्रिया। और एकमात्र यही सच्चा जीता-जागता चमत्कार है।

उत्तर – ‘नमस्कार करना’ यानी केवल हाथ जोड़ना नहीं, बल्कि मन को ग़लत दिशा से उचित दिशा में मोड़ना।

मन तो अति चंचल एवं अत्यंत विशाल है। उसे खोजना बहुत कठिन है।

‘मन:’ का विरोधि शब्द है ‘नम:’। केवल हाथ जोड़कर प्रणाम करना यह नमस्कार नहीं है, बल्कि मन को ग़लत दिशा से  उचित दिशा में मोड़ना ही नमस्कार है।

‘मन’ और ‘नम’ इन दो शब्दों के बीच स्थित है, ‘नाम’ यह शब्द। मन को उचित दिशा देनेवाला ‘उत्प्रेरक’ (catalyst) है ‘नाम’, तो अनुचित दिशा देनेवाला उत्प्रेरक (catalyst) है ‘मान’ (अहंकार)।

मेरे जीवन की ‘धारा’ (मन) मुझे विपरीत दिशा में मोड़कर ‘धारा’ को ‘राधा’ बनाना चाहिए।

और ‘राधा’ यानी क्या? शुद्ध, निष्काम और एकनिष्ठ भक्ति।

‘राधा’ अर्थात् ‘ह्लादिनी’… आह्लादिनी शक्ति। जीवन को आह्लाद-दायक बनानेवाली परमेश्वर की ‘प्रेमशक्ति’।

उत्तर – जिससे सदा सर्वदा केवल पवित्रता एवं आनंद उत्पन्न होता है, वह सत्य है।

जिससे मानव को बहुत सुख मिल सकता है, परन्तु उससे पवित्रता उत्पन्न नहीं होती, वह है असत्य।

जिससे मनुष्य को पवित्रता की प्राप्ति होकर तात्कालिक सुख भी मिल जायेगा, किन्तु अन्य लोगों के लिए दुखदायक एवं परमेश्वर को आनंद देनेवाला नहीं है, तो वह भी असत्य ही है।

उदाहरण – एक व्यक्ति ने सदा ‘सच’ बोलने की क़सम खाई है और वह व्यक्ति अपने घर के आँगन में बैठा है। इतने में सामने से एक भयभीत युवती दौड़ते हुए आई और उससे बोली, ‘‘मुझे बचाओ। मुझपर बलात्कार करने के लिए कुछ गुंडे मेरे पीछे-पीछे दौड़ते हुए आ रहे हैं।’’ यह सुनकर उस व्यक्ति ने उस युवती को अपने घर में छिप जाने को कहा। उसका पीछा करते हुए वे गुंडे भी वहाँ आ पहुँचे और उस व्यक्ति से पूछा, ‘‘वह लड़की जो यहाँ भागते हुए आई, वह कहाँ है?’’ इसपर उस व्यक्ति को क्या उत्तर देना चाहिए? सच बोलने की क़सम ली है, इसलिए ‘वास्तविकता’ बता देनी चाहिए? ‘‘हाँ, वह मेरे घर में छिपी है।’’ निश्‍चित ही इसका अर्थ ऐसा ही होगा, ‘‘आओ, यहाँ देखो यही है, इसपर बलात्कार करो।’’ ऐसा घटित होने पर, बोलना एवं करना ‘वास्तविकता’ के अनुसार तो होगा, परन्तु ‘सत्य’ के अनुसार नहीं होगा। क्योंकि इस आचरण से ना तो पवित्रता उत्पन्न होगी और ना ही आनंद, ना तो उस व्यक्ति के जीवन में, ना ही उस युवती के जीवन में और ना ही उन गुंडों के जीवन में।

उत्तर – दास्यभक्ति का अर्थ याचना, लाचारी, परतन्त्रता, परावलम्बित्व या दुर्बलता नहीं, बल्कि ‘मेरे स्वामी जितने समर्थ हैं, उतना ही समर्थ मैं भी बनूँगा’, यह इच्छा रखकर उनके चरणों में रहकर विनम्रता से उनके सभी नियमों से स्वयं को बाँध लेनाही दास्य भक्ति का वास्तविक अर्थ है।

परमेश्‍वर के प्रेम, निर्भयता और पावित्र्य इस त्रिवेणी संगम का दास्यत्व स्वीकार करनाही परमात्मा का दास्यत्व है।

दास्यभक्ति अर्थात् सम्पूर्ण शरणागति। बिल्कुल भगवान श्रीकृष्ण के कहेनुसार,

          सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।

          अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

भगवान कहते हैं, ‘‘हे मानव, तुम सभी गुणधर्मों को छोड़कर सिर्फ मेरी शरण में आजाओ। मैं तुम्हें पूर्ण पापमुक्त करके सर्वोच्च स्थान प्रदान करूँगा।’’

हर एक कर्म करते समय प्रथम परमेश्वर का विचार करना, यह दास्यभक्ति की पहली शर्त है।

हर एक कर्म परमेश्वर के लिए ही करना, यह दास्यभक्ति की दूसरी शर्त है।

परमेश्वर मेरी इच्छाओं को पूरी करेंगे इस विचार का त्याग करके, परमेश्वर मेरे जीवन के लिए जो उचित है वही करेंगे, यह दृढ़निश्चय रखना ही दास्यभक्ति की तीसरी शर्त है।

मेरी सेवा-भक्ति का फल मैं नहीं माँगूँगा। उन्हें जो कुछ देना होगा, वे देंगे। उसीमें ही मैं आनन्दपूर्वक रहकर उनकी अधिक से अधिक सेवा किस प्रकार कर सकता हूँ, बस इसी सोच के साथ जीवन में क्रियाशील रहना यही दास्यभक्ति की चौथी शर्त है।

मेरे ‘किन्तु’ ‘परन्तु’ और मेरी ‘शर्ते’ खत्म होने के पश्‍चात् ‘सुख मिलेे या दुख, लेकिन मुझसे आप अपना कार्य करवा लीजिए’ यही तीव्र और सच्ची इच्छा ही इस दास्यभक्ति की पाँचवी शर्त है।

भगवान की सेवा और प्रेम में ही अधिकाधिक आनन्द प्राप्त होने लगता है और फिर गृहस्थी तथा पारमार्थिक दृष्टि से जीवन वास्तविक रूप से सम्पन्न होने लगता है। इस गृहस्थ जीवन की सम्पन्नता मुझे दास्यत्व से दूर न ले जाए, उसी प्रकार परमार्थ से प्राप्त होनेवाली उन्नति के कारण कहीं मेरे अहंकार की वृद्धि न हो, इस बात का ध्यान रखना यह दास्यभक्ति की छठी शर्त है।

हनुमानजी के आचरण को ही एकमात्र आदर्शमार्ग और भरतजी के आचरण को ही एकमात्र दिग्दर्शक यन्त्र मानकर जीवनयात्रा करना ही दास्यभक्ति की सातवी और सबसे महत्त्वपूर्ण शर्त है।

उत्तर – हमारे जीवन में आने वाले ९९% सुख-दुख भी थोड़े ही समय में गायब हो जाते हैं अथवा उनका स्वरूप ही बदल जाता है।

इस थोड़े से समय को ठीक से समझ लेना और इस थोड़े से समय में अपने आप को भ्रम में न रखना ही सबुरी है।

यह सबुरी ही मेरे मन में उत्पन्न होने वाले अनावश्यक डर, क्रोध, मोह को दूर कर सकती है।

‘सबुरी’ का अर्थ ‘स़िर्फ राह देखना’ यह नहीं है,

बल्कि इसका अर्थ है- प्रश्‍न का हल ढूँढ़ने के लिए परिश्रम करते हुए यह विश्‍वास कायम रखना कि मेरे प्रिय भगवान मेरा घात नहीं होने देंगे, वे मुझे उचित फल देंगे ही।

दुनिया में सभी प्रकार का ढोंग भी किया जा सकता है, यहाँ तक कि अमिरी, वीरता और श्रद्धा का ढोंग भी किया जा सकता है; परन्तु सबुरी का दिखावा कोई भी कभी भी नहीं कर सकता और यहीं पर आकर झूठी श्रद्धा और झूठी भक्ति का भांड़ा फूट जाता है।

उत्तर – जब आस्तिक्यबुद्धि जीवात्मा के मूल स्थान की जानकारी हासिल कर लेती है और उस प्रयत्न में आसपास के विश्‍व का अध्ययन करती है, तभी इस परमात्मा के सत्य, प्रेम एवं आनंद इन तीन मूल गुणों की पहचान होती है, विश्‍व की प्रत्येक क्रिया एवं प्रतिक्रिया में इस त्रिसूत्री का अनुभव होने लगता है।

यही (परमेश्वर) इस संपूर्ण जगत् के एकमात्र कर्ता एवं करानेवाले हैं, इस बात का दृढ़ निश्‍चय होता है। वही श्रद्धा है।

सामान्य मानव भी ‘चिंतन’, ‘मनन’, ‘शोध’ (अनुसंधान) इत्यादि बड़े-बड़े शब्दों का ज्ञान न होने पर भी स्वयं के व्यावहारिक अनुभवों एवं दैनिक जीवन में होने वाले प्रसंगों से निर्माण होनेवाले एहसास के द्वारा ही ‘श्रद्धा’ सीखता है, स़िर्फ कोई मन पर अंकित करता है, बार बार ज़ोर देकर कहता है, इससे श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती। इस जन्म में सहजता से श्रद्धाभाव का निर्माण होना, यह मेरे पूर्वजन्म की श्रद्धा का अपरिहार्य परिणाम होता है।

उत्तर – जिसने अपने भूतकाल में अर्जित किये ज्ञान के अनुसार, वर्तमानकाल में विवेक धारण कर, भविष्यकाल की चिन्ता और निश्चित कर्मफल की अपेक्षा (एक्स्पेक्टेशन) न करते हुए कर्मसातत्यता बनायी रखी, वही वास्तविक अर्जुन, वही वास्तविक जय और वही सच्चा शिष्य, वही सच्चा भक्त है।

उत्तर – भक्ति अर्थात् अत्यन्त प्रेमपूर्वक किया परमेश्वर का स्मरण, दर्शन, गुणगान, निःस्वार्थ सेवा और सत्य, प्रेम एवं आनंद इन परमेश्वरी तत्त्वों को अपने जीवन में उतारनेके लिए किये गये सभी प्रकार के परिश्रम।
भज्-सेवायाम् – भज् धातु का अर्थ ही मूलत: प्रेमपूर्वक सेवा यह है।
मैं अपने परमेश्वर की अत्यन्त श्रद्धा से जो सेवा करता हूँ, वही भक्ति है।
इसी का अर्थ है भक्ति अर्थात् परमेश्वर से प्रेम करना और परमेश्वर की ही ऐसी अनगिनत संतानें, जो बदक़िस्मती की मारी हैं, उनकी सेवा करना।
परमेश्वर का प्रेम प्राप्त करने का मार्ग ही भक्ति है।
भक्ति यानी ‘भाव’ यह हृदय होनेवाली, नित्य वृद्धिंगत होनेवाली, अंतरंगी प्रेमशक्ति और सस्नेह सेवा है।
धर्मपालन, स्वकर्तव्यपालन और ये बातें करते हुए सातत्यपूर्वक बनाये रखा और दृढ़ होते जानेवाला स्वयंभगवान के अस्तित्व का एहसास ही परिपूर्ण भक्ति है।
वहीं, ‘भाव’ यानी अन्तःकरण में उमड़ी हुई भावना।

भक्तिभाव चैतन्य के संबंध में प्रश्न यहा पूँछे