भक्तिभाव चैतन्य विस्तृत

भक्तिभाव चैतन्य (Devotion Sentience) अर्थात् वास्तविक ‘अध्यात्मदर्शन’ अर्थात् देवाधिदेव को, इस विश्‍व के नियन्ता को, मानवी सुख के अधिष्ठान को यानी स्वयंभगवान को और उसकी लीलाओं को जानना, पहचानना और उन्हें अपने जीवन में ले आना।

स्वयंभगवान त्रिविक्रम याने भक्तिभाव चैतन्य का सगुण, साकार चिरंतन स्वरूप।

‘त्रिविक्रम मेरा देवाधिदेव और मैं उसके चरणों का दास’ ऐसी अवस्था मन में लाकर भक्त जो कुछ करता रहता है, वह सब कुछ ही भक्तिभाव चैतन्य है।

अर्थात् ‘मेरा इष्टदेव, मेरा देवाधिदेव, मेरा जन्मनायक’ इस दृढनिश्‍चय से स्वयंभगवान त्रिविक्रम की की गयी, की जाने वाली नवविधा भक्ति में से कोई भी एक अथवा दो अथवा तीन अथवा चार अथवा सारी की सारी भक्ति।

आदिमाता और दत्तगुरु के प्रति होनेवाली स्वयंभगवान की भक्ति ही मूल भक्ति होने के कारण, प्रत्येक भक्त द्वारा की जानेवाली किसी भी दैवत की भक्ति अंतत: भक्तिभाव चैतन्य में ही आकर मिलती है।

‘भक्तिभाव चैतन्य’ यानी स्वयंभगवान का प्रेम।

अर्थात् भक्तिभाव चैतन्य और स्वयंभगवान में भेद ही नहीं है; और यही ‘भक्तिभाव चैतन्य’ का महत्त्वपूर्ण रहस्य है।

‘भक्तिभाव चैतन्य’ यानी स्वयंभगवान और भक्तिभाव चैतन्य में रहना यानी उस भगवान के विशाल स्वरूप में ही रहना; और यह तो अपने आप ही घटित होता है। यह सारा संसार और उसमें रहने वाले परमाणुओं में भी ‘वह’ स्वयंभगवान पहले से ही प्रवेश कर बसा है और इसी लिए उसे महाविष्णु कहते हैं। (‘विश्’ इस संस्कृत धातु का अर्थ ‘प्रवेश करना’ ऐसा है।)

‘यह स्वयंभगवान आकाश के रूप में सर्वत्र है। वह मेरे भीतर भी है और बाहर भी है’ इस भावना का जतन करना ही भक्तिभाव चैतन्य है।

स्वयंभगवान त्रिविक्रम मुझसे जितना प्रेम करता है, उसके एक दशमलव (१/१०) प्रेम भी मेरे अनगिनत जन्मों में मेरे आप्त (सगे-संबंधी) रह चुके सभी के द्वारा भी मुझसे किया गया नहीं होता, इसे जानकर ‘उस’से बहुत प्रेम करते रहना ही भक्तिभाव चैतन्य है।

ज्ञानचिन्तन से, बहुत बड़ा अध्ययन करने से त्रिविक्रम को कोई जान नहीं सकता। इसे जानना यह केवल इससे और इसके चरणों से प्रेम करने से ही साध्य हो सकता है और इससे बढ़ता रहने वाला प्रेम करते रहना ही भक्तिभाव चैतन्य है।

त्रिविक्रम के नाम, रूप और गुण इन पर पूर्णत: मोहित हो जाना और बार बार उसी का स्मरण होते रहना यही है, त्रिविक्रम भक्तिभाव चैतन्य।

मुख में त्रिविक्रम का मंत्रगजर, अंत:करण में सद्गुरु त्रिविक्रम के प्रति बढने वाला प्रेम और निरंतर उसके चरणों के प्रति होने वाला खिंचाव अर्थात् उसकी सेवा करने के प्रति होने वाली लगन’, इसे ही ‘त्रिविक्रम भक्तिभाव चैतन्य’ कहा जाता है।

स्वयंभगवान त्रिविक्रम का जो रूप स्वयं को पसंद हो, वही सच है।

‘उस’का जो स्वरूप, जो नाम और जो लीला हमें पसंद है, उसे अपने हृदय में रखना और इससे निस्सीम प्रेम करना। परन्तु इसके लिए ‘उस’के पीछे से, उसके मार्ग पर से ही चलते रहना पडता है और इसी को कहते हैं भक्तिभाव चैतन्य का गुप्तसूत्र - चरैवेति, चरैवेति। भजैवेति, भजैवेति। - ‘उस’के पीछे से आगे आगे चलते रहना और भक्ति करते रहना।

और वेदों का ही आदेश है - ‘चरैवेति। चरैवेति।’ - ‘चर एव इति’।

‘भक्तिभाव चैतन्य’ यह भगवान को अर्थात् स्वयंभगवान को अपने जीवन में ले आने वाला और अपने हृदयसिंहासन पर उसकी प्राणप्रतिष्ठा करने का सर्वश्रेष्ठ राजमार्ग है।

भक्तिभाव चैतन्य यह केवल एक ही जन्म को नहीं, बल्कि अगले सभी जन्मों को आनन्द से भर देने वाला सर्वोच्च तत्त्वज्ञान है, सर्वोत्कृष्ट पवित्र आचरण है और योगमार्ग, ज्ञानमार्ग और कर्ममार्ग इन तीनों बहुत ही कठिन रहने वाले मार्गों को बहुत ही आसान बनाकर श्रद्धावान के जीवन में भगवान का अधिष्ठान स्थापन करने वाला भाव है, सच्चिदानन्द धर्म है अर्थात् सच्चिदानन्द जीवनमार्ग है।

‘मैं भगवान का अंश हूँ’ यानी मैं भगवान से अलग नहीं हुआ हूँ, इस सच को जीवन में उतारने का सर्वश्रेष्ठ और अत्यधिक सरल, आसान मार्ग है भक्तिभाव चैतन्य।

और इसी लिए सभी मानवों के लिए स्वयंभगवान की लीलाएँ ही ज्ञान है, भक्तिभाव चैतन्य के मंत्रगजर से भगवान के साथ स्वयं को जोड़ लेना ही योग है और अपने अच्छे-बुरे सारे कर्मों को उस स्वयंभगवान के चरणों में अर्पण करते हुए उससे प्रेम करते रहना ही कर्म है, इन तीन सूत्रों से समृद्ध ‘भक्तिभाव चैतन्य’ इसी लिए सभी प्रवृत्ति वाले मानवों के लिए, सभी तरह के स्वभावों वाले व्यक्तियों के लिए निश्‍चित रूप से जीवन सुखी करनेवाला अद्वितीय मार्ग है।

और इसीलिए ‘अपने जीवन में किसी भी व्यक्ति, ध्येय, वस्तु, पदार्थ और सुख की अपेक्षा इस स्वयंभगवान से अधिक प्रेम करना’ यही सभी समीकरणों को सुलझाने वाला एकमात्र ‘चैतन्यसूत्र’ है।

स्वयंभगवान त्रिविक्रम केवल भक्तिभाव चैतन्य में ही लिप्त हो जाता है। पाप का पापत्व और पुण्य का पुण्यत्व इन दोनों बातों से वह स्वयंभगवान अलिप्त होता है। भक्तिभाव चैतन्य में रहनेवाले को उद्धरण का मार्ग खुला कर दिया जाता है और थोड़ी प्रतीक्षा के बाद खुद स्वयंभगवान उन्हें पापमुक्त कर देता है और इस प्रकार ‘कर्म के अटल सिद्धान्त’ का प्रभाव कम कर दिया जाता है, नष्ट कर दिया जाता है। सुदुराचारी अर्थात् जो अत्यन्त एवं सर्वथा दुराचारी हैं, जिन्होंने पापों की अन्तिम मर्यादा को लाँघ दिया है, जिन्होंने कोई भी पाप करने का बाकी नहीं रखा है ऐसे मूढ़ों को भी, उन्होंने भक्तिभाव चैतन्य में प्रवेश करने पर, स्वयंभगवान उन्हें पापहीन कर देता है।

जो श्रद्धावान अधिक से अधिक त्रिविक्रम भक्तिभाव चैतन्य में रहता है, उसी के पाप जला दिये जाते हैं।

भक्तिभाव चैतन्य से गृहस्थी भी सुख की हो जाती है, विभिन्न विघ्न दूर हो जाते हैं, कई अवसर और यश पास आ जाते हैं। भक्तिभाव चैतन्य ही सर्वश्रेष्ठ तप है और इसी से ‘वह’ श्रद्धावानों के अधीन हो जाता है।

जब भक्त के मन में दास्य, सख्य और शरणागति इन भावनाओं का बीच बीच में ही सही, लेकिन उच्चारण होने लगता है, तब तब स्वयंभगवान स्वयं उस भक्तिमार्गी को तेज़ी से आगे ले जाता है और उसके द्वारा की गयी अल्प-स्वल्प सेवा को दस गुना बनाकर स्वीकार करता रहता है और बड़ी ही कोमलता से भक्तिमार्गीय को श्रद्धावान बनाकर अर्थात् स्वयं का सखा बनाकर ‘भक्तिभाव चैतन्य’ में ले आता है।

श्रद्धावान बनने के लिए आवश्यकता है, केवल एक ही बात को जानने की - सच्चा और १०८% प्रेम केवल इस एक से ही मिल सकता है और यह स्वयंभगवान वैसा प्रेम करने के लिए सदैव उत्सुक होता है।

और एक बार यह जान लिया जाये तो उसके बाद भक्त श्रद्धावान बन जाता है और भक्तिभाव चैतन्य में अर्थात् आनन्दसरोवर में रहने लगता है।

भक्तिभाव चैतन्य में ‘स्वयंभगवान कर्ता है और मैं उसका दास हूँ’ यह दृढ़ भावना होती है।

भक्तिभाव चैतन्य में हम स्वयंभगवान के दास के रूप में रहते हैं और उसी समय अपरंपार सामर्थ्य और अनिरुद्ध गति रहने वाला वह स्वयंभगवान हमारा दास और प्रिय सखा बनकर रहता है।

नवविधा भक्ति अलग अलग दिखायी दे अथवा अलग अलग प्रतीत हो, परन्तु इन नौ भक्तियों का मूल स्वरूप ‘दास्योत्तर सख्य’ अर्थात् दास बनकर सखा बनना यही है।

जिसके पास भक्तिभाव चैतन्य है, उसके हृदय में ही यह हृदयस्थ रहता है।

जन्म में अन्य सब कुछ मिल जाये, परन्तु भक्तिभाव चैतन्य न मिले, तो जो मिला है उसका आनन्द नहीं लिया जा सकता और भक्तिभाव चैतन्य मिल जाये, तो न मिली बातें भी सुखदायी सिद्ध होती हैं।

केवल इसका भक्तिभाव चैतन्य यही एकमात्र शाश्‍वत सत्य है - जिसमें तुम्हारा सारा बोझ उठाने का सामर्थ्य है।

मनुष्य की सभी प्रकार की अच्छी क्षमताओं को विकसित करने का एकमात्र रसायन (संजीवक औषधि) है ‘भक्तिभाव चैतन्य’।

श्रद्धावानों के जीवन में पड़ने वाला भगवान का कदम है ‘स्वयंभगवान का मंत्रगजर’।

‘मेरे जीवन की खेती का मैं केवल किसान हूँ और यह स्वयंभगवान मालिक है’ इस बात को मन में अच्छी तरह अंकित करते हुए मंत्रगजर की मालाएँ करते रहना (मंत्रगजर का जाप करते रहना) ही भक्तिभाव चैतन्य है।

भक्तिभाव चैतन्य में हमें केवल अधिक से अधिक मन्त्रगजर करते रहना होता है और ‘उस’के प्रेम का स्वीकार करना होता है।

भक्तिभाव चैतन्य में जिसने प्रवेश किया है, ऐसे श्रद्धावान के लिए स्वयंभगवान श्रीत्रिविक्रम, उसका मंत्रगजर, कलियुग में रहनेवाले उसके रूप का ध्यान, उस रूप के प्रति प्रेम, उस रूप की सगुण भक्ति और सेवा और चण्डिकाकुल के जो देवता उस श्रद्धावान को पसंद हैं, प्रिय हैं, उन इष्टदेवता की उस श्रद्धावान द्वारा की गयी भक्ति, किया गया पूजन यह सभी एकरूप ही है।

हर एक मानव को, अपने जीवन को प्रारब्ध के घने जंगल में से सुचारु रूप से बाहर निकालने के लिए एक ही बात की आवश्यकता होती है और वह बात है सद्गुरु भक्तिभाव चैतन्य (Sadguru Devotion Sentience) ।

यहाँ पर सद्गुरु अर्थात् नित्यसद्गुरु अर्थात् स्वयंभगवान त्रिविक्रम और भक्तिभाव चैतन्य का अर्थ है, जैसे भी संभव हो वैसे, जितना हो सके उतना, अधिक से अधिक प्रमाण में उसके नामस्मरण में, अनुभवसंकीर्तन में, लीलाश्रवण में, भजन-अभंग श्रवण में, चरित्रपठण में, पूजन में, सेवा में, उसका ध्यान करने में रहना अर्थात् उसके साथ निरंतर जुड़ा (Connected) रहना और उसके निरंतर संपर्क (Communication) में रहना और वह भी कैसे? - तो चैतन्य से अर्थात् जीवित रूप में, रसभीने रूप में। क्योंकि उसकी भक्ति ही मानव को सही मायने में जीवित रखती है, उसके जीवन को रसभीना बनाती है। क्योंकि सारे विश्‍व की और विश्‍वातीत रहने वाली ‘आद्य जीवनीय शक्ति’ अर्थात् जगदंबा उसके हृदय में रहती है।

रामनाम, पंचाक्षरी शिवमंत्र (ॐ नम: शिवाय) और श्रीगुरुचरणों में संपूर्ण शारण्य (श्रीगुरु की पूर्णत: शरण में जाना) ये तीन बातें भक्तिभाव चैतन्य की गंगा पर रहने वाले काशी, प्रयाग और हरिद्वार हैं,

और भक्तिभाव चैतन्य की गंगा, यमुना और सरस्वती इनका संगम होकर बनने वाली ‘त्रिवेणी’ अर्थात् ‘चैतन्यगंगा’ यह आदिमाता जगदंबा अर्थात् परांबा है।

संपूर्ण भगवद्गीता और संपूर्ण रामायण यह भक्तिभाव चैतन्य का अर्थात् स्वयंभगवान का ग्रंथस्वरूप है।

‘त्रिविक्रम भक्तिभाव चैतन्य’ यह कभी भी समाप्त न होनेवाला अक्षय्य खज़ाना है, जिसे हर एक श्रद्धावान भरभरकर लूटकर ले जा सकें, और इस खजाने को मन:पूर्वक लूटने की अनुमति, अनुज्ञा, छूट त्रिविक्रम ने ही दी हुई है।

त्रिविक्रम भक्तिभाव चैतन्य का वास्तविक रहस्य संपूर्ण दास्यत्व यह है और उस रहस्य से खुलनेवाला द्वार सख्यत्व का है।