‘अध्यात्म’

यह शब्द सुनकर कई बार आम इन्सान की स्थिति ‘साधासुधा जीव अध्यात्म कळेना, घाबरून राही दूर दूर’ (भोलाभाला जीव, न समझे अध्यात्म, रहे डरकर दूर दूर) ऐसी होती है।

आम इन्सान के मन में होनेवाले अध्यात्मविषयक भय को दूर कर, भक्ति के बारे में होनेवालीं ग़लतफ़हमियों को दूर कर,

‘भगवान के भक्तिभाव चैतन्य' में रहकर हर कोई भगवान के सामिप्य की प्राप्ति कर सकता है’

यह विश्‍वास दृढ़ करने का तथा सादे-सरल शब्दों में भक्तिविषयक मार्गदर्शन करने का चे कार्य सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध (बापु) अपनी वाणी, लेखनी तथा आचरण के माध्यम से कर रहे हैं।

श्रीमद्पुरुषार्थ ग्रन्थराज प्रथम खण्ड अनुसार

‘आत्यंतिक निवृत्तिवाद और ऐहिक स्वार्थ से जुड़ा प्रवृत्तिवाद इन दोनों एकांतिक बातों से व्यक्तिजीवन में एवं समाज में असमतोल निर्माण होता है; भक्ति की सहायता से निष्काम कर्मयोग सिखानेवाला मार्ग ही मानवधर्म को परमेश्वरी ऐश्‍वर्य प्राप्त करा देता है।

आध्यात्मिक जीवन

‘हमारे जीवन का हर एक कार्य हम परमेश्‍वर के लिए कर रहे हैं और परमेश्‍वर को हर बात उसी पल ज्ञात होती है,

यह ध्यान में रखकर जीना ही आध्यात्मिक जीवन है; और यही मार्ग वास्तविक सन्तोष, शान्ति एवं नित्यप्रसन्नता देनेवाला होता है।’

(श्रीमद्पुरुषार्थ ग्रन्थराज प्रथम खण्ड सत्यप्रवेश चरण 1)

अध्यात्म क्या है, यह स्पष्ट करते हुए सद्गुरु श्रीअनिरुद्ध (बापु) कहते हैं -

‘सन्मार्ग पर चलते हुए व्यवहार करते रहना और इसी तरह व्यवहार करते करते अंतर्मन को धीरे-धीरे परमेश्वरी मन के प्रवेश के लिए खाली करते रहना ही अध्यात्म है;

और जीवन में ‘अध्यात्म’ इस अंतिम ध्येय को साकार करने के लिए देहोपयोगी क्रिया सन्मार्ग से चलाना ही व्यवहार है।

‘सत्य, प्रेम, आनंद’ यही एकमात्र अध्यात्म की त्रिसूत्री है।

वहीं भक्ति, सेवा एवं संस्कारों का शुद्धीकरण यही अध्यात्म के साधन हैं।

व्यावहारिक जीवन जीते समय ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम अधिक सन्मार्ग से करना अर्थात् धर्म से अर्थ और काम इन पुरुषार्थों की प्राप्ति करना,

यही आध्यात्मिक जीवन की पहली सफल सीढ़ी है

और इस तरह गृहस्थी करते हुए सेवा और भक्ति का अवलंबन करके स्वयं का अधिक शुद्धीकरण करके बदलाव लाना यह

अध्यात्मवाद की दूसरी सफल सीढ़ी है।

अध्यात्म और वास्तव इन दोनों का भान रखना आवश्यक है, इसके बारे में बापु कहते हैं -

‘जिस अध्यात्म का उपयोग व्यावहारिक रूप में नहीं होता यानी जिस अध्यात्म को वास्तव का भान नहीं होता,

वह अध्यात्म व्यर्थ ही है। इसी तरह जिस व्यवहार में अध्यात्म का भान छूट जाता है,

परमेश्‍वर की विस्मृति हो जाती है,वह व्यवहार महज़ व्यर्थ ही नहीं, बल्कि दुखदायक भी साबित होगा।’

अध्यात्मदर्शन : भक्तिभाव चैतन्य  (Devotion Sentience) अर्थात् वास्तविक ‘अध्यात्मदर्शन’ अर्थात् देवाधिदेव को, इस विश्‍व के नियन्ता को, मानवी सुख के अधिष्ठान को यानी स्वयंभगवान को और उसकी लीलाओं को जानना, पहचानना और उन्हें अपने जीवन में ले आना।

‘दैनिक प्रत्यक्ष’ के अपने पहले अग्रलेख में डॉ. अनिरुद्ध धैर्यधर जोशी लिखते हैं -

जीवन का सर्वांगीण विकास कराके शान्ति और तृप्ति का आनन्द लूटने के लिए हर एक को आवश्यकता होती है उद्धरेत् आत्मना आत्मानम्इस महावाक्य का अर्थ सुचारु रूप से समझकर उसके अनुसार आचरण करने की।

एकदम सरल-सादी भाषा में, ‘माझा उद्धार फक्त मीच करू शकतो’ (‘मेरा उद्धरण केवल मैं ही कर सकता हूँ’)। फिर चाहे वह सामान्य प्रापंचिक जीवन के विकास का मार्ग हों, या फिर पूरी तरह ‘मैं’पन (अहं) को मिटाकर परमेश्‍वर के साथ एकरूप  होने का मोक्षप्राप्ति का मार्ग हों, परिश्रम मुझे ही करने होते हैं।

लेकिन इस मार्गक्रमणा में - ‘सत्य यानी क्या और ‘प्रेम’ यानी क्या, इसका ठीक तरह से परिचय रहना आवश्यक है।

जिसमें से पवित्रता उत्पन्न होती है या क़ायम रखी जाती है, वही सत्य है।

लेकिन जीवन के प्रवास में यदि ‘प्रेम’ न हों, सत्य कमज़ोर पड़ जाता है। प्रेम यानी ‘बिना लाभ की प्रीति’। ऐसा प्रेम, यह इस दुनिया की सबसे बड़ी ताक़त है। प्रेम की ताकत के सामने कोई भी संहारक एवं विघातक पीड़ादायी शक्ति हमेशा हारती रहती है। मेरा प्रपंच, मेरा गृहस्थाश्रम, यह इस प्रकार का प्रेम करना सीखने की सबसे बड़ी और एकदम आसान कार्यशाला है।

अपने जीवन की बाक़ी बैसाखियाँ फेंककर यदि वास्तविक रूप में आत्मनिर्भर बनना हों, तो सत्य और प्रेम का अनुसरण कर, परमेश्‍वर ही मेरे एकमात्र और वास्तविक आधार हैं’ यह दृढ़विश्‍वास मन पर अंकित करना पड़ता है।

सत्य और प्रेम के बग़ैर किये गए सारे कर्मकांड, विधियाँ और भक्ति के नाटक यानी ऐसे ही खोख़ले गड़ोलने (पांगुळगाडे) हैं। उनके प्रयोग से हम अधिक से अधिक अपाहिज़ बनते जाते हैं। वहीं, सत्य और प्रेम के मार्ग पर चलकर की हुई भक्ति हमें पूर्णत: आत्मनिर्भर और इसी कारण सफल बनाती है।