महर्षि अगस्ति से मेरी पहली मुलाकात हुई, रामचरित में और वहाँ निर्माण हुआ स्नेह आगे चलकर बढ़ता ही गया। चारों वेद और पुराण तथा दक्षिण भारत की लोककथाएँ, प्रथाएँ एवं लोकगीत, साथ ही महर्षि अगस्ति के मंदिर इनके एकत्रित तेज से, अनंत की प्राप्ति करनेवाले इन ऋषिश्रेष्ठ की एक प्रतिमा बनती गयी। इन्होंने क्या कुछ नहीं किया? जवाब एक ही है। इन्होंने जो जो उत्कृष्ट, परममंगल और भारतीय संस्कृति का संवर्धन करनेवाला है, वह सब प्रचंड परिश्रमों से साध्य भी किया और सिद्ध भी किया।

लिखित साहित्य में से महर्षि अगस्ति का अध्ययन करते हुए अचानक से मैं दक्षिण भारत के छोटे से गाँव में रहनेवाले अगस्तिमंदिर में जा पहुँचा और वहाँ से अगस्ति नामक दिव्य एवं भव्य चरित्र के अनेक गुह्य सूत्र स्पष्ट होने लगे। उसी मंदिर में मुझे दक्षिण भारत स्थित अन्य, अक्षरशः सैंकड़ों अगस्ति-मंदिरों की जानकारी मिली। उन सभी मंदिरों के आचार्यों, उपासकों और शिल्पाकृतियों के भाव-अविष्कार से अगस्ति सदैव मेरी बुद्धि में डटे रहे।

जिस तरह समुद्रगुप्त की बराबरी का अन्य कोई हो नहीं सकता, उसी तरह दूसरे अगस्ति का होना भी संभव नहीं है।

(क्रमशः)

सौजन्य : दैनिक प्रत्यक्ष

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