हम भगवान को पुष्प क्यों अर्पण करते है? – सदगुरु श्री अनिरुद्ध

सदगुरु श्री अनिरुद्ध पितृवचन

( गुरुवार, दिनांक ३० मई २०१९)

हरि ॐ, श्रीराम, अंबज्ञ.

नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌.

आप सभी लोगों ने कभी ना कभी पूजा की हैं या नही? एक बार जिंदगी में कम से कम पूजन किया है या नहीं? कितने लोगो ने किया? [लोग हाथ ऊपर करते हैं]

तो पूजा करने में एक बहुत important part क्या रहता है? फूल चढ़ाना, राईट? पुष्प अर्पण करना। हम कभी कभी फूल अर्पण करते है, कभी फूलों की माला यानी ‘हार’ जिसे कहते हैं वह अर्पण करते हैं। लेकिन फूल अर्पण करना, यह पूजा का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। कभी हम लोगों ने सोचा है कि फूल ही क्यों अर्पण किये जाते हैं? किसने सोचा? हात ऊपर करो। [लोग हाथ ऊपर करते हैं]

सो फूल कहाँ होते हैं? पेड़ो पर। और ये फूल ही आगे जाकर फल बनते हैं। फल में क्या होता है? फल में बीज होते हैं, बीजों से फिर से बहुत सारे पौधें बन सकते हैं। लेकिन ये फूल जो होते हैं ना, वैसे हमारे मन में विचार होते हैं - विचार, थॉट्स, आईडियाज्‌, युक्ति, प्लॅन्स, राईट? जैसे फूलों से फल बनते हैं; वैसे जो आईडियाज् हैं, विचार हैं, कल्पना हैं, प्लॅन्स हैं, उनसे आगे चलकर क्या बनते हैं? ऍक्शन यानि कार्य, कर्म, क्रिया। So पहले क्या होता हैं? मन में विचार होता है, वह बढ़कर आगे ऍक्शन होती है, क्रिया होती है। पहले विचार, बाद में क्रिया। एक बार विचार का रूपांतर क्रिया में हो गया, तो फिर उसके आगे कुछ हो नही सकता। फूल ‘फल’ बन गया, पर फल फिर से ‘फूल’ नही बन सकता। वैसे ही, आईडियाज्‌ जो हैं हमारीं, हमारे जो विचार हैं, वे एक बार कृति में, क्रिया में बदल गये, यानी क्रिया हो गयी; तब बाद में उसे दुरूस्त करना बहुत डिफिकल्ट हो जाता है।

भगवान को हम फल भी अर्पण करते हैं, फूल भी अर्पण करते हैं; लेकिन फूल हर रोज़ अर्पण किये जाते हैं, लेकिन फल हर रोज़ अर्पण नहीं किये जाते। फूल ये प्रतिनिधित्व करते हैं, रिप्रेझेंट करते हैं हमारे विचारों का। हमारे मन में असंख्य विचार आते रहते हैं। कभी-कभी हम सोचने बैठ जाते हैं एक कुछ पर्पज लेकर, ध्येय लेकर, कुछ विश लेकर कि क्या करना है, क्या उचित है, क्या अनुचित है; ये सोचने के बाद हम कुछ निर्णय पर आ जाते हैं और बाद में उसके आधार से हम कार्य का आरंभ कर देते हैं। लेकिन हमारे भारतीय संस्कृति के महर्षियों ने, ब्रह्मर्षियों ने बताया कि ‘जे जे ब्रम्हांडी, ते ते पिंडी। जे जे पिंडी, ते ते ब्रह्मांडी’। यानी जो भी कुछ देह में है, इस मानवी शरीर में है, वह सब कुछ इस विश्व में है और विश्व में जो कुछ भी है, वह सब कुछ एक मानवी देह में भी होते हैं। यानी क्या? यानी बाहर जो सूरज है, चाँद है, वैसे सूरज, चाँद हमारे देह में भी हैं। बाहर जैसा आकाश है, Sky है, वैसे हमारे शरीर में भी है। बाहर जैसे इतने सारे विश्व हैं, आकाशगंगा हैं, वह सब कुछ हमारे अंदर भी है, सब कुछ है; और इस तत्त्व को जान लेने के बाद उन लोगों ने जब तत्त्वचिंतन को आरंभ किया, यानी तपश्चर्या आरंभ की, तो वे जानने लगे कि पेड़ों-पौधों पर, लताओं पर, बेलियों पर जो फूल उगते हैं, जिनसे आगे चलकर फल बनते हैं, वे फूल और हमारे मन में आनेवाले विचार, ये एक समान है। जो हमारे मन में विचार हैं, वही बाहर फूल हैं और जो हमारी क्रिया है वही फल है। So भगवान को अगर अर्पण करना है, तो पहले क्या करना चाहिये? फूल अर्पण करने चाहिये, यानी हमारे विचारों को अर्पण करना चाहिये। अर्पण किये हमारे विचारों को भगवान नें ग्रहण कर लिया, तो क्या होगा? भगवान जो भी ग्रहण करता है, वह Best बन जाता है, शुद्ध बन जाता है, अच्छा बन जाता है। यानि जब हम फूल भगवान को अर्पण कर रहे हैं, Actually हम क्या अर्पण कर रहे हैं? हमारे मन के विचारों को अर्पण कर रहे हैं। लेकिन इस प्रतीक उपासना के पीछे जो भावना थी, वह चली गयी। अब हम बस्स् हमारे पुरखों से फूल फेंके जाते है भगवान पर, इसलिए हम भी फूल फेंकते रहते हैं।

कल से देखिये, आप जब पूजन करने के लिये, पूजा करने के लिये बैठेंगे, तो एक एक फूल चढ़ाते समय मन में सोचना। ऐसे नहीं सोचना कि (इस फूल के साथ) ये विचार अर्पंण किया, (उस फूल के साथ) ये विचार अर्पण किया। ऐसा सोचने की कोई आवश्यकता नहीं। इतना ही सोचना कि ये फूल क्या हैं? ये केवल मेरे मन के विचारों का प्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि मेरे विचारों का ये फूल ये स्थूल रूप हैं। विचार तो स्थूल रूप नहीं होते, सूक्ष्म रूप में होते हैं; तो विचारों का स्थूल रूप क्या है? फूल हैं। इसीलिये हमेशा कहा जाता है कि सुगंधित फूलों को ही अर्पण करना चाहिये। अगर सुगंधित फूल नहीं हैं, तो कम से कम सुंदर दिखनेवाले फूलों को तो अर्पण करना चाहिये। अगर सुगंधित फूल भी नही हैं और सुंदर दिखनेवाले फूल भी नहीं हैं, तो जो भी फूल उस समय प्राप्त हैं उस सीज़न के अनुसार, उन्हीं को सुगंधित फूल मानकर अर्पण करना चाहिये। यानी भगवान को हम सब प्रकार के फूलों को, यानी सब प्रकार के विचारों को अर्पण कर सकते हैं।

आप पूछोगे, ‘बापू, ऐसे फूल मिले हम लोगों को, जिन्हें ना सुगंध है, ना ही अच्छे दिखते हैं, तो क्या हो जायेगा?’ (उसका भी जवाब है) आप में से कोई जानता है कि कौनसा फूल है, जिससे बड़ी दुर्गंध आती है? सुरण, चूरन, याम जिसे हिंदी में कहते हैं; उसका जो फूल होता है ना, वह एक भी उग गया, तो कम से कम एक किलोमीटर के एरीया में कोई बैठ नहीं सकता, इतनी दुर्गंध फैलाता है। लेकिन उसे भी अर्पण करने का शास्त्र कहा गया है! देखिये, जो फूल इतनी दुर्गंध देता रहता है कि जहाँ भी ये फूल खिलता है सूरण का, याम का, उस एक किलोमीटर के एरीया में कोई इन्सान बैठ भी नहीं सकता आराम से; ऐसे फूल को अर्पण करने की भी आज्ञा भगवान पाराशर ने, ब्रह्मर्षि पाराशर ने दी हुई है।

क्या कहते हैं पाराशरजी? ‘जब भी हम पहचान जाते हैं कि हमारे मन में बहुत गंदे विचार ही बढ़ते जा रहे हैं, तब यह पुष्प जो है, उसे लाकर भगवान के चरणों में अर्पण करके, बाद में उससे जला देना चाहिये।’ क्या कहा है? भगवान के चरणों मे अर्पण करके, बाद में उसे जलाकर, उसकी राख नदी में बहा देनी चाहिये। यानी कि हमारी संस्कृति ने इस दुर्गंध फैलानेवाले फूल को भी नकारा नही हैं। इसका मतलब यह है कि हमारे ब्रह्मर्षियों ने जाना था कि एक इन्सान के मन में बुरे विचार, गंदे विचार आ सकते हैं और उससे उसका भाग्य बाद में बहुत ही बुरा हो सकता है।

So अब हमने जाना कि पूजा हम जो फूल अर्पण करते हैं, ये Actually क्या होते हैं? हमारे मन के विचारों का स्थूल स्वरूप होते हैं; और जो फल होते हैं, जो मिठाईयाँ होती हैं, जो नैवद्य होता है, वह क्या होता है? हमारे जो कर्म होते हैं, उनका स्थूल स्वरूप होता है। इसीलिये हमें बार बार कहा जाता है - ‘जब घर में कोई पूजा होती है, तो घर के बढ़े-बूढ़े क्या बोलते हैं? भगवान को अर्पण किये बिना उस दिन नही खाना चाहिये।’ केवल उस दिन नहीं, हर दिन। हम लोग प्रार्थना कहते है ना, खाना खाने से पहले -  ‘अन्नग्रहणसमये स्मर्तव्यं नाम श्रीहरे:, भवति सहजहवनं अनायासं ही नाम्ना। जीवनं जीवितेभ्या अन्नं हि पूर्णब्रह्म, नैतद् उदरभरणं जानियात् यज्ञकर्म॥ श्रीराम’। यानी ‘राम’ का नाम लेकर उस अन्न का हम यज्ञ के रूप में स्वीकार करते हैं। So हमारे विचारों का स्थूल स्वरूप ही ‘फूल’ है, हमारे कर्मों का स्थूल स्वरूप ही ‘फल’ है।

तो फिर हमारे कर्मों के जो परिणाम, कर्मों के फल जो हमें मिलते हैं, उसका प्रतिनिधित्व क्या होता है पूजा में? (अभी फल तो यहाँ हमने देखे कि कर्मों का स्थूल स्वरूप हैं; तो कर्मों के परिणामों का प्रतिनिधित्व क्या होगा?)

अरे, कर्म ही फ़ल हैं, यानी फ़ल ही कर्म है। येस, कर्म ही फ़ल हैं। फल कहाँ निकलेगा? कर्म से ही निकलेगा ना? ‘जैसी करनी वैसी भरनी।’ यानी जैसा हमारा कर्म, वैसा ही फल होगा, बराबर? कर्म अच्छा होगा, तो फ़ल अच्छा होगा, कर्म बुरा होगा, तो फ़ल बुरा होगा। अर्थात् यहाँ ‘कर्म’ और ‘कर्मफल’ को अलग करने की कोई आवश्यकता नहीं है। हमें जानना चाहिए कि जैसा कर्म है, वैसा  ही फल होने के कारण, (कर्म के फल के लिए, परिणामों के लिए) और कुछ अर्पण करने की आवश्यकता ही नहीं होती, जब हम फल और फूल अर्पण करते हैं।

So, अब हम लोग समझ गये कि हम जो फल या कोई नैवेद्य, कोई शर्करा, मिठाई जो भी अर्पण करना चाहते हैं, वह क्या होता है? हमारे कर्म होते हैं, हमारे हात से होनेवाली क्रियाएँ होती हैं, हमारे जीवन में घटित होनेवाला कार्य होता है। इसे भगवान को अर्पण करना बहुत ही आवश्यक होता है। क्यों? हम लोग अभी जान गए कि ऐसा करने से वह अच्छा हो जाता है, शुद्ध हो जाता है। उसके भी आगे चलकर कुछ देख लेना चाहिए। क्या? बहुत बार बताया मैंने कि साईबाबा ने कहा है, ‘माझे तो काय आहे। एक गुणे घेतो दशगुणे देतो।’ मैं जो एक लेता हूँ, तो दस देता हूँ।

मैं पूछता हूँ, ‘क्यों?’

देखो मैंने बार-बार कहा है, हमारे सारे वेद, सारे उपनिषद्‌, सारे पुराण, सारे ग्रंथ अगर किसीने जला दिये समझो, (वैसे किसी में जलाने की शक्ति नहीं हैं), लेकिन मानो नष्ट हो गए और केवल एक श्लोक बाकी रह गया, तो पूरी की पूरी भारतीय संस्कृति बच जायेगी। मैंने ग्रंथराज में भी यह बात कही हुई है। कौनसा मंत्र है? ईशावास्य उपनिषद्‌ का पहला श्लोक -

‘ईशावास्यमिदं सर्वं

यत्किञ्च जगत्यां जगत् ।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा

मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ।।’

बस! ये चार लाईनें रह गयी ना, बस! पूरी की पूरी भारतीय संस्कृति, चारों वेद, अठारह पुराण खुद बच जायेंगे अपनेआप। यह पहला पद जो है - ‘ईशावास्य इदं सर्वं।’  - ‘इस विश्व में जो मुझे दिखायी देता है, जिसे मैं देख सकता हूँ या न देख सकता हूँ, जिसका स्पर्श महसूस कर सकता हूँ या न महसूस कर सकता हूँ, वह सभी का सभी ईश्वर की सत्ता में ही है।’ Everything is ruled and governed by The Almighty. इस विश्व में जो दिखाई देता है और नहीं दिखाई देता है, वह सब कुछ किसकी सत्ता में आता है? उस स्वयंभगवान की सत्ता में ही है। ये बात अगर जान ली, तो सबकुछ आसान हो जाता है। यानी मैं.... ‘मैं’ यानी हर कोई, आप में से हर कोई, इस विश्व में अंतर्भूत हैं, राईट? इसका मतलब क्या है? मुझपर भी किसकी सत्ता चल रही है? ईश्वर की ही सत्ता चल रही है, रहनेवाली है। वही सत्ताधीश है। हम खुद को कितना भी सत्ताधीश क्यों न मानें, कितना भी मानते रहें, असल में सारी सत्ता उस एक ही मुठ्ठी में रहती है। ‘ईशावास्यं इदं सर्वं।’ पूरे विश्व में जितने भी पदार्थ हैं (मॅटर) और जितनी भी ऊर्जा हैं यानी (एनर्जी सोर्स), सभी पर सत्ता किसकी है? संचलन कौन करता है? एक ‘वो’ ही। The Only One. (स्वयंभगवान!) तो एक बार ये चीज़ जान लो - ‘ईशावास्य इदं सर्वं।’ कि जिस मन में मेरे विचार आते हैं, उस मेरे मन पर भी किसकी सत्ता है? ईश्वर की - स्वयंभगवान की।

लेकिन यह किसके लिए? फलदायी-हितकारक किसके लिए? जो मानता है इस सत्ता को, उसके लिए हितकारक। जो इस सत्ता को मानता नहीं, उसके लिए अहितकारक। तो हमें इस सत्ता को स्वीकारना चाहिए। सत्ता तो है ही।

देखिये, मानो बाहर ज़ोर से वर्षा हो रही है। हमने देख लिया, फिर हम चल पड़े घर से। रेनकोट नहीं, छाता नहीं, कुछ भी नहीं। क्या होगा? भिगनेवाले हैं। थोड़ा आगे जाकर देखा, रास्ते में पानी भरा हुआ है, लेकिन हम चलते रहे। बाद में देखा कि पानी कन्धे तक आ रहा है, फिर भी चलते रहे। क्या होगा? पानी सिर से ऊपर चला जायेगा और फिर थोड़ी ही देर में डूब जायेंगे और बाद में  एक दिन के बाद, उपर आयेंगे फिर से, बहुत heavy होकर, तो नुकसान किसका है? बाहर देखने गये थे, उससे सीखना चाहिए।

अपने जीवन में झाँककर देखिये। जो भी घटनाएँ घटित हैं, कितनी तुम्हारे हाथ में थीं? कितनी तुम्हारे बस में थीं? एक टक्का भी नहीं होंगी। यानी सत्ता किसी दूसरे के हाथ में हैं, ड़ोर किसी दूसरे के हाथ में हैं। फिर हमारे हाथ में सिर्फ़ क्या है? भक्तिकार्य करना, कार्य करना है, भक्तिभावचैतन्य में रहना है, अपना-अपना काम, अपनी-अपनी ज़िम्मेदारी उठाना है, बस्स्! बाकी कोई अधिकार हमारे हाथ में नहीं है।

मैंने बार-बार बोला है, यह तुम्हारा घर नहीं है। यह ‘वसुंधरा’, यह पृथ्वी, ये तुम्हारा घर नहीं है। ये तुम्हारा बोर्डिंग स्कूल है, जहाँ तुम्हारे बाप ने भेजा है पढ़ने के लिए। पढ़ाई खत्म करने के बाद वहीं फिर लौटना है, अपने घर को।

लेकिन इसका संबंध क्या है इधर....उदाहरण में ? मैं बात कर रहा था कि ‘सारी सत्ता ‘उस’की है’ तो यही सीखने के लिए भेजा जाता है। जब हमारे पूरे अंतर में सम्मिलित हो जाता है कि ‘सत्ता सिर्फ उसकी है, सब पर सत्ता उसकी ही चलती है’ और अगर एक बार उसका स्वीकार कर दिया पूरे अंत:करण के साथ; तो इसे कहते हैं ‘शरणागति’ - ‘आत्मनिवेदनम्‌’....नवविधा भक्ति में नौंवी भक्ति ‘आत्मनिवेदनम्‌’। यानी संपूर्ण शरणागति....लाचारी नहीं। शरणागति का मतलब ‘लाचारी’ नहीं है। उसकी सत्ता को पूर्ण रूप से मानना यही शरणागतता है और यही सीखने के लिए हमें यहाँ भेजा जाता है, ‘जीवन का अंतिम रहस्य क्या है? सुख का अंतिम रहस्य क्या है?’ कि उस ईशसत्ता को मानना, स्वीकारना।

मेरे जीवन में जो भी हो रहा है, वह सबकुछ किसकी सत्ता के अंदर है? उस स्वयंभगवान की सत्ता के अंदर है। ‘वो’ चलाता है, ‘वो’ सबकुछ बदल सकता है और बदलता रहता है। मैं कितना भी चाहूँ, जब तक इस सत्ता को स्वीकार नहीं करता, तब तक मेरा विकास नहीं हो सकता, राईट।

इसीलिए पूजन करना बहुत आवश्यक है। पुष्प अर्पण करना, फूल अर्पण करना अनिवार्य है। फल अर्पण करना आवश्यक है और सबसे उपर ‘नमस्कार’ यानी ‘उस’की सत्ता को मानना, सत्ता को स्वीकारना, सत्ता को अपनाना और यह सत्ता ही मेरे लिए हितकारक है, यह निर्धार दृढ़ होना।

जिन लोगों ने ग्रन्थराज का दूसरा खंड ‘प्रेमप्रवास’ पढ़ा है, वे जानते हैं ‘नवविधानिर्धार’ को। उसका एक मंत्र हम लोग कहते हैं - ‘रावणवध: निश्चित:।’ गुरुक्षेत्रम्‌ में दररोज कहा जाता है। किसको याद है? ‘युद्धकर्ता श्रीराम: मम। समर्थ दत्तगुरु मूलाधार:। साचार: वानरसैनिकोऽम्‌। रावणवध: निश्चित:। इति श्रीअनिरुद्धमहावाक्यम्‌।’

Yes, इस महावाक्य को भूलना नहीं। ‘रावणवध’ यानी भय का वध, अपयश का वध, पराभव, पराभूत मानसिकता का वध, Failure का वध, Depression का वध, न्यूनगंड का वध, दुख का वध। रावण का वध होना आवश्यक है। रावण के बीस हाथ कौनसे हैं, हमने पढ़े हुए हैं। सारे के सारे हाथ राम ने काट दिये थे और इसी कारण हमें जानना चाहिए कि ‘युद्धकर्ता श्रीराम: मम।’ ‘मम’ यानी ‘मेरा’। मेरा राम ही युद्ध करनेवाला है, मुझे सिर्फ वानरसैनिक बनकर रहना है।

हम लोग खुद युद्ध करने की सोचते हैं। मार खाकर, पीटपीट कर, आँखें दोनों काली बनाकर वापस आ जाते हैं, रोते रहते हैं, right? इसकी आवश्यकता नहीं है। युद्ध करने वाला श्रीराम है, उसे करने दीजिये। सिर्फ अपनी ज़िम्मेदारी उठाना। कौनसी ज़िम्मेदारी? सेतू बाँधने की, उसकी सेना में रहने की।

o.k.? So, कल से जब पूजा करोगे, तो क्या करोगे?

फूल अर्पण करते समय यही सोचना कि ‘भगवान, मेरे जो विचार हैं अच्छे-बुरे, भले-बुरे कैसे भी हों, तुम्हे अर्पण कर रहा हूँ।’

प्रसाद या नैवेद्य चढ़ाओगे, तो क्या सोचोगे? ‘हे भगवन्‌, जो मेरे सारे कर्म हैं, मैं उन्हे आपको अर्पण कर रहा हूँ।’

और नमस्कार करते समय क्या सोचना? ‘हे भगवन्‌, तेरी ही सत्ता है, बस तेरी ही सत्ता है, यह मैं जानता हूँ।’

सिर्फ इतना बोलिये कि ‘मैं जानता हूँ’। जानने से सब कुछ होता है।

नक्की? [नक्की]

नक्की? [नक्की]

नक्की? [नक्की]

और कल से आप लोगों ने फूल सिर्फ फेंकना बंद नहीं किया, तो मैं पत्थर फेंकना शुरू कर दूँगा। ओ.के.?

अरे नहीं यार, नहीं मारूँगा। बाद में लग जायेगा, तो मुझे ही तकलीफ होगी। ओ.के.? लेकिन कान जरूर खींचूँगा।

हरि: ॐ॥ श्रीराम॥ अंबज्ञ॥

नाथसंविध्‌॥ नाथसंविध्‌॥ नाथसंविध्‌॥

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