उसका ‘शब्द’ ही ‘संरक्षक’ है। – सदगुरु श्री अनिरुद्ध – २३ मई २०१९

सदगुरु श्री अनिरुद्ध पितृवचन

( गुरुवार, दिनांक २३ मई २०१९)

हरि ॐ, श्रीराम, अंबज्ञ.
नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌.

बड़ी खुशी में लग रहे हैं सब लोग, क्या बात है? खुशी का कारण तो मुझे पता नहीं, लेकिन लग रहे हैं।

मैंने बचपन में एक कहानी सुनी थी कि एक गाँव में एक बुढ्ढी औरत रहती थी, अकेली रहती थी। लेकिन पूरा दिन वह बहुत बिझी रहती थी, गाँव के सभी लोग उसके पास आते थे, सलाह-मशवरा लेने के लिए। बहुत अच्छी थी, दयालु थी, बड़ी सूज्ञ थी, अच्छा विचार करनेवाली थी। उसका अपना कोई ऐसा रिश्तेदार नही था। भाई, बहन, पति, बच्चें ऐसा उसका कोई भी नहीं था, अकेली थी। ये सभी लोग उसके पास पूरे विश्वास के साथ जाते थे। गाँव में दूसरी एक और, उसकी ही उम्र की एक औरत रहती थी। वह सोचती थी, सभी लोग उसी के (पहली औरत) पास जाते हैं; मैं भी उसी की उम्र की हूँ, मेरे पास क्यो नहीं आते? हमेशा उसके मन में विचार रहता था, Jealousy तो हो ही जाती है, राईट?

सभी लोग उसके पास क्यों जाते हैं? इसने सोचा कि ‘हाँ, वह अकेली है, उसका पति नहीं है।’ फिर उसने अपने बुढ्ढे को देखा, ‘यह बुढ्ढा क्या कर रहा है अभी तक? मर क्यो नहीं जाता? ये मरेगा, तो सब ठीक हो जायेगा।’ उसने बुढ्ढे का पत्ता कट कर दिया; यह सोचकर कि ‘अभी तो लोग मेरे पास आयेंगे’। लेकिन कोई नहीं आया। बाद में देखा कि ‘उसके (उस पहली बुढ्ढी औरत के) बच्चें नहीं हैं, अपने घर में तो आठ-आठ बच्चे हैं, क्या करने का? इन्हें तो मार नहीं सकते, इन्हें तो भगा देना चाहिये।’ आठों बच्चों को भगा दिया। अभी अकेली रहने लगी, फिर भी कोई भी नही आया। उसने सोचा कि ‘बुढ्ढे को उपर भगा दिया, बच्चों को यहाँ वहाँ भगा दिया, मैं अकेली रह रही हूँ, फिर भी कुछ नहीं। हाँ, मैं बड़े घर में रहती हूँ और वह झोपड़ी में रहती है।’ यह खयाल आया, तो घर फूक डाला और झोपड़ी में रहने गयी। उसने सोचा कि ‘बस्स्, अभी तो लोग मेर पास आयेंगे’, फिर भी लोग नहीं आये। तो इस औरत ने सोचा की ‘अभी क्या ऐसा है उसके पास, जो स्थिति मेरे पास नही है? सब कुछ है मेरे पास। बुढ्ढा नहीं है, बच्चे नहीं हैं, घर भी नहीं है, जैसी वह है वैसी ही मैं भी हूँ, फिर लोग मेरे पास क्यो नहीं आते? अभी जाकर देखना चाहिए।’ फिर हर रोज़ सुबह से शाम तक उसके (पहली बुढ्ढी के) घर के बाहर जाकर बैठने लगी, देखने लगी कि ‘लोग कैसे आते हैं, क्या करते हैं, क्या बोलते हैं?’ तो उसने देखा कि ‘कोई भी उसके पास आता है, तो इस औरत को सभी लोग प्रणाम करते हैं और ‘माँजी, माँजी’ कहकर पुकारते हैं और यह जो है सभी को ‘मेरे बच्चे’, ‘मेरे भाई’, ‘बेटी’ ऐसा कहकर बात करती है।’ उसने सोचा कि ‘चलो मुझे भी ऐसा कुछ करना चाहिये।’ फिर वह गली-गली में घुमकर सबको, ‘मेरे बच्चे’, ‘मेरे बेटे’, ‘मेरी बेटी’ ऐसा बोलने लगी। तो दो-तीन दिन के बाद छोटे-छोटे बच्चे उसके पीछे दौड़ने लगे, ‘ए पगली, ए पगली, ए पगली’ करके। तब वह उन्हें मारने दौड़नी लगी। उसे गुस्सा आ गया, ‘ये बच्चे मुझे ‘पगली’ क्यो बोलते है?’ तो वह बच्चों के पीछे दौड़ने लगी। तो बाकी बड़े-बड़े लोग भी दौड़ने लगे ‘ए पागल, ए पागल, ए पागल’ कहते हुए। अब रात को वह बहुत खुश हो गयी, ‘कितने लोग मेरे पीछे दौड़ रहे हैं।’

समझ गये Moral of the story? ‘येनकेनप्रकारेण प्रसिद्ध पुरुषो भवेत’। राईट?
पहली औरत के पास लोग आते हैं, उसका सम्मान करने के लिए। उसे ना खुशी है, ना गम है। वह अपने खुशी में काम कर रही है लोगो के भलाई के लिए। वह किसी के पीछे नहीं दौड़ रही है। वहीं, यह दूसरी बुढ्ढी है.... उसने पति का पत्ता कट कर दिया और बच्चों को भगा दिया, खुद के घर को जला दिया, झोपड़ी में आकर रहने लगी। बाद मे क्या हुआ? लोग उसके पीछे आने लगे, कैसे? ‘ए पागल, ए पागल, ए पागल, ए पगली, ए पगली, ए पगली’ करके। लेकिन क्या वह सही है? नहीं। दृश्य देखो, तो पहली बुढ्ढी के पास लोग सिर्फ चलकर जाते हैं। इस दूसरी बुढ्ढी के पास लोग दौड़कर आते हैं, उसके पीछे भागते हैं। ये लोगों के बच्चों के पीछे भाग रही हैं। वहाँ भी बड़ा जनसमूह, यहाँ भी बड़ा जनसमूह है। यहाँ लोग उसे हस रहे हैं, उसपर तरस खा रहे है। वहाँ लोग हैं, जो उसका (पहली बुढ्ढी का) सम्मान कर रहे हैं। यानी मतलब क्या है? बाहर के दिखावे से कुछ नहीं हासील होता, राईट? हमें अगर किसीके यश का रहस्य जानना है, तो हमें जानना चाहिए कि इस यश के पीछे क्या है? यश के पीछे जो चीज़ होती है, उसे देखना बहुत आवश्यक होता है।

हर कोई सक्सेस चाहता हैं, हर कोई यश चाहता है; लेकिन यश का जो बाहर का दिखावा होता है, उस बाहर के दिखावे का अनुकरण करके हमें कुछ हासील नहीं होता। मैं बहुत बार देखता हूँ, बाजू के घर में रहनेवाले लड़के को ९८% मार्क्स मिले। ‘कौनसे क्लास में जा रहा था?’ ‘इस क्लास में’, फिर अपने बच्चों को भी इसी क्लास में डाला। वह १६ घंटे स्टडी करता था, इसको भी १६ घंटे बंद कर दो दूसरे कमरे में। अरे, हर एक की पर्सनॅलिटी अलग है, वह नहीं हम लोग सोचेंगे। हर एक अपना चाहता सब्जेक्ट अलग है, वह नहीं हम सोचेंगे। सिर्फ देखावे पे जाते हैं। इसमें क्या होता है हमेशा? पराभव ही स्वीकार करना पड़ता है हमें, पराभूत ही होना पड़ता है।

इसीलिए कभी भी जिंदगी में हमें अगर आगे बढ़ना है, हमें प्रगती करनी हैं, तो दूसरों की प्रगती देखकर, बाहर से अंदाज़ा लगाकर उसके हिसाब से कुछ कार्य करना फालतू चीज़ है। उससे हम कुछ नहीं हासील कर सकते। इसीलिए हमें जानना चाहिये कि उस यश के पीछे, सक्सेस के पीछे सही मूल्य क्या होता है। कौनसा भी क्षेत्र हो, पैसा कमाने का क्षेत्र हो, नौकरी का क्षेत्र हो, पढ़ाई का क्षेत्र हो, जीवन का क्षेत्र, कहाँ भी। एक पति ने अपनी पत्नी के लिए गुलाब के फूल लाये, वह खुश हो गयी। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि दूसरे पति की पत्नी भी गुलाब के फूल देखकर ही खुश हो जायेगी। उसकी अपनी-अपनी ज़रूरत और चाहत कुछ अलग होगी। So, एक ही सूत्र सब जगह काम नहीं करता, यह जानना बहुत आवश्यक है और दिखावे वाला जो सत्र है, जो बाहर दिखता है, वह कभी भी सही सूत्र नहीं होता।

क्यो? ऐसा क्यो होता है? हम लोग देखते हैं, हिन्दी फिल्मस्‌ में देखिये, मराठी फिल्मस्‌ में देखिये, कौन सी भी regional languages में देखिये, कुछ actors बहुत अच्छे actors होते हैं। उनकी फिल्मे बहुत बार चलती नहीं। लेकिन जो actors उतने ठीक नहीं होते, उनकी movies बहुत चलती हैं। वह success किसका होता? क्या सिर्फ उस हिरो, हिरॉइन का होता है? नहीं। उसके साथ जो स्क्रीप्ट राईटर, जो प्रोड्युसर, जो पब्लिसिटी करनेवाला है, जो कोरिओग्राफ़र हैं, इन सबकी मेहनत का वह फ़ल होता है। ये जो जानता है, वह सबके साथ हाथ मिलाकर आगे चलता है। जो नहीं जानता है, वह खुद को सुपरस्टार मानने लगता है। चार-पाँच फिल्मस्‌ के बाद लोग भूल जाते हैं उसको, राईट?

स्पोर्टस्‌ में देखिये, क्रिकेट है या फूटबॉल है, या जो भी है, अगर वह दूसरे संघ से, जो Opposite संघ है उससे कुछ सीखता नहीं, तो प्रोग्रेस नहीं कर पाता। फूटबॉल में ‘मेसी’ का नाम सभी लोगों ने सुना होगा। उससे पहले ‘पेले’ था। ‘पेले’ के नाम को तो आज भी कोई क्रॉस नहीं कर सकता। क्योंकि पेले खुद पढ़ाई करता था, अभ्यास करता था कि दूसरे खिलाड़ी कैसे खेल रहे हैं। वे कैसे ड्रेस पहन रहे हैं, कौन सी जीम में जा रहे हैं, ये वह नहीं देखता था। वह ये देखता था, वो खेलते कैसे हैं? खेलते समय उनकी मुव्हमेन्टस्‌ कैसी होती हैं? हलचल कैसे होती है, इसे वह देखता था, उससे सीखता था। इसीलिए पेले को आज भी कोई भी क्रॉस नहीं कर सका है। हर कोई अपनी जिंदगी में ‘पेले’ बन सकता है यानी अपने-अपने field में best बन सकता है। लेकिन कब? जब हम इन बाहर दिखनेवाली चीज़ों का अनुकरण करना बंद कर दें और इसकी जो सही मायने रखनेवाली चीज़ें होती हैं, उनको लक्ष्य करके, उनको अपनाने की कोशिश करेंगे तब ही।

भक्ति में भी वही होता है। हमारी हर एक की भक्ति अलग-अलग है, यह पहले जानना सीखो। दूसरा ऐसे कर रहा है, इसलिए मुझे ऐसा ही करना चाहिए इसकी कोई आवश्यकता नहीं। यह हमें मालूम हैं कि हम जैसे हैं, वैसे ही हमें ‘वो’ अपनाता है; और हर एक का queue (क्यू) अलग-अलग है। फिर क्यों किसी की कॉपी करनी है? कोई आवश्यकता नहीं। दूसरे के साथ सलाह-मशवरा ज़रूर कीजिए। आप क्या करते हो? कैसे करते हो? ज़रूर जान लिजिए। लेकिन अपने- अपने प्रकृति के अनुसार हर एक की चाहत, हर एक की capacity - क्षमता अलग-अलग होती है, राईट?

बहुत लोगों को ऐसा सवाल उठता है, ‘बापू हम सोलह माला करते हैं।’ बहुत ही सुंदर बात है। ‘लेकिन फिर बाकी कुछ करने को टाईम नहीं रहता।’ गलत। काम करते-करते हम माला कर सकते हैं। मैने ऐसा कब कहा था कि एक जगह बैठकर कीजिए। घूमते, चलते कहीं भी कीजिए। अगर सोलह माला करने को हमें टाईम नहीं मिल रहा है, तो बारह माला किजिए, दस माला किजिए, आठ माला किजिए, चार माला किजिए। जितनी ज़्यादा कर सकते हो, उतनी कीजिए, बस्स् that is most important. ‘उसने सोलह माला कीं, इसीलिए उसको यह मिला’ यह सोचकर अगर आप लोग भी सोलह माला कर रहे हैं, तो उससे फ़ायदा नहीं होनेवाला। हम दिल से जितना कर सकते हैं, वह सबसे important है।

क्योंकि भक्ति में सबसे महत्त्वपूर्ण बात क्या है? आपका विश्वास कितना है और आपका प्रेम कितना है? आप सोलह माला रोज़ की कर रहे हैं, लेकिन विश्वास बिलकुल नहीं हैं और प्रेम तो नाम के लिए भी नहीं; तो वो सोलह की सोलह माला फ़िर भी काम आएँगी, लेकिन १००%....१०८% नहीं। और १०० और १०८% में बहुत सारा, ढ़ेर सारा फ़र्क है।

बहुत बार मैं देखता हूँ, लोग भगवान का इम्तिहान लेना चाहते हैं, परीक्षा लेना चाहते हैं। मैंने बहुत बार देखा है और बड़ा मज़ा आता है मुझे। ऐसे कोई इम्तिहान लेना चाहता है भगवान का, तो मैं देखता रहता हूँ। मैं सिर्फ प्रेक्षक हूँ, that's all ! तो मैं देखता रहता हूँ कि कैसे परीक्षा ले रहा है। और जब भगवान ‘साई’ के रूप में, ‘राम’ के रूप में पृथ्वी पर विचरण कर रहा होता है, तब परीक्षा लेने के हमें बहुत सारे मौके मिलते हैं।

लेकिन एक बात ध्यान में रखो, मैंने बार-बार बताया है - जो परीक्षा लेना चाहता है भगवान की, उसे भगवान खुद ही mislead करता है। उसे भगवान ही गलत राह पर ले जाता है। यह सही बात है। कैसे? देखिये, यहाँ मैं एक छोटीसी story आपको बताता हूँ। आज stories का ही दिन है, लगता है शायद।

So, एक बार एक संत के पास एक लड़का गया....अब संत बोलिये, महाराज बोलिये, बुवा बोलिये, सद्‌गुरु बोलिये, जो भी बोलिये लेकिन अच्छा था। उसके पास एक लड़का गया। उस महाराज ने उस लड़के को बताया, ‘भाई, ऐसी-ऐसी चीज़ करनी है।’ अगले हफ्ते वह लड़का वापस आया, महाराज को बोला, ‘महाराज, मैं भूल गया, आपने क्या बोला था?।’ महाराज बोले, ‘मैं भी भूल गया।’ लड़के ने सोचा, ‘देखो, इसका मतलब इसमें कुछ ताकत ही नहीं है। ये झूठा है, इसके पास जाने का कोई फायदा नहीं।’ अब बात ऐसी है, उस लड़के के साथ-साथ एक दूसरा लड़का भी आया हुआ था। जो यह पहला लड़का चाहता था, वही बात वो दूसरा लड़का भी चाहता था। उसने पूरा विश्वास रखा, लेकिन वह भी भूल गया....सचमुच ही भूल गया था। वह भी महाराज के पास पुन: आया, उसने पूछा, ‘महाराज, मैं भूल गया।’ महाराज ने उसे बता दिया कि ‘मैं ये बोला था।’

यह फर्क़ है - पहला लड़का क्या करने आया था? इम्तिहान लेने आया था, ‘ये (महाराज) जो बोले हैं, इन्हें याद है या नहीं?’ उसने बोला, ‘मुझे याद नहीं।’ महाराज ने भी बोला, ‘मुझे याद नहीं"। उसका दोस्त सच बोल रहा था। उसने बोला, ‘बराबर याद नहीं’, तो महाराज ने याद कराके दिया कि ‘मैं यह बोला था।’

तो यह ध्यान में रखिये, इम्तिहान लेने की कोशिश कभी नहीं करना जिंदगी में। भगवान की exam लेने का अधिकार हमारे पास नहीं है, कभी भी नहीं है, कतई नहीं है। So सोलह माला करके आप लोगों को ऐसा लग रहा है कि हम लोग उसकी exam ले रहे हैं, तो impossible. वो सबसे परे है, तो exam से भी परे ही है।

क्योंकि ‘वो’ किसी की exam नहीं लेता। वो किसी की परीक्षा नहीं लेता। आज़माईश करेगा, लेकिन exam नहीं लेगा। हमें ऐसे लगता है कि हम exam दे रहे हैं। मैं स्कूल और कॉलेजवाली exam की बात नहीं कर रहा हूँ, जीवन की परीक्षा की बात कर रहा हूँ।

इसीलिए भाई, जिंदगी में दूसरे को देखकर कुछ भी करना बंद कर दो। जो सही है, उसे ढूँढ़ो। जो सही है, वही करो और एक ही बात ध्यान में रखो -
Perfect सिर्फ़ ‘वो एक’ ही है, बाकी कोई भी perfect नहीं हो सकता। उसका ‘शब्द’ ही ‘perfect’ है, उसका ‘शब्द’ ही ‘बल’ है, उसका ‘शब्द’ ही ‘औषध’ है, उसका ‘शब्द’ ही ‘टॉनिक’ है, उसका ‘शब्द’ ही ‘संरक्षक’ है। ओ.के.?

नक्की? [नक्की]
नक्की? [नक्की]
नक्की? [नक्की]

हरि: ॐ॥ श्रीराम॥ अंबज्ञ॥

॥ हरि: ॐ॥ श्रीराम ॥ अंबज्ञ॥ नाथसंविध्‌॥

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