सदगुरु श्री अनिरुद्ध पितृवचन

( गुरुवार, दिनांक २७ जून २०१९)

हरि ॐ, श्रीराम, अंबज्ञ.

नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌.

अभी-अभी बरसात हो गयी, राईट? थोड़ीसी बौछार आ गयी, लेकिन हवा में कितना बदलाव आया! छोटी-छोटी चीज़े जिंदगी में कितने मायने रखती है, यह जो देखता है, वही आगे चल सकता है। लेकिन बहुत बार ऐसा होता है ज़िंदगी में, हर एक की जिंदगी में, हम छोटी-छोटी बातों को भूल जाते हैं। हमें ऐसा लगता है, हमारा कोई एक जो लक्ष्य होता है, उसपर हम लोग मन केंद्रित करते हैं, हमारा भाव केंद्रित होता है और छोटी छोटी बातों को हम भूल जाते हैं। सीधी साधी बात होती है - घर में समझो छ्: लोग रह रहे हैं या चार लोग या पाँच या दस लोग रह रहे हैं, लेकिन घर में रहते हुए भी वे एक दूसरे को पहचानते नहीं। कितनी बार ऐसा होता है। जिसके साथ शादी होकर बीस साल हुए हैं, उसे भी कितने लोग पहचानते हैं पता नहीं, क्योंकि उनकी छोटी छोटी बातें हमारी नज़र में आती नहीं, हम देखते नहीं।

अगर आपको पूछें, जहाँ आप रहते हैं, वहाँ से समझो कोई नज़दीक कोई स्टेशन है, बस-स्टॉप है, या फिर ऑफिस है, या मंदिर है, या जो भी है, जहाँ से हम लोग हर रोज जाते हैं, अब अगर पूछा जायें कि ‘रास्ते में क्या क्या है?’ तो 90 out of 100 times गलत जवाब आयेंगे। जिंदगी में हमे बहुत बार ऐसा लगता है कि बड़ी बहादुरी की, बड़ी बड़ी बातें करने से ही, बड़े-बड़े कार्यों को करने से ही जश हासिल होता हैं, यश हासिल होता है, ऐसी बात नहीं होती। हर कोई चीज़, हर कोई बात बड़ी होती है अपने-अपने हिसाब से। हम बहुत बार भूल जाते हैं कि एक छोटासा स्माईल, एक छोटासा स्मितहास्य कितना बहुत फ़र्क़ करता है हमारी ज़िंदगी में। मैंने बहुत बार देखा है हमारे घर में जो हम लोग हैं, कितनी बार स्माईल करते हैं? खुद को पूछो। सिर्फ़ यहाँ आये, अनिरुद्ध को देखा, तभी ज़ोर से स्माईल ‘हाऽ....हरि ॐ’। लेकिन घर में अपनी माँ को देखकर, अपनी बीवी को देखकर, या अपने मियाँ को....पति को देखकर कितनी बार स्माईल करते हैं? पूछो, खुद को पूछो और आप जान जायेंगे कि महीने के तीस दिन में मैंने मेरे पति को या पत्नी को महीने में Maximum एक बार स्माईल दिया होगा बिना वजह के; And not a sarcastic smile....a genuine good smile. अपने बच्चों के साथ वो छोटे हैं, तब तक तो हम खेलते हैं। एक बार बच्चें बड़े हो गये, तो उनके साथ भी सवाल जवाब क्या होते हैं? पढ़ाई की? स्कूल में क्या हुआ? कितनी मस्ती करता है? थोड़ा आवाज़ बंद कर, अंदर जाके बैठ। बस्स्, राईट?

हम उपदेश करते रहते हैं, हर कोई सद्‍गुरु बन जाता है अपनी-अपनी ज़िंदगी में....दूसरों के लिए। हर कोई हर दूसरे के लिए सद्‍गुरु का काम करने लगता हैं, कन्सल्टन्ट् का काम करने लगता है। अपनी खुद की ज़िंदगी को कभी नहीं देखता। ये छोटीं-छोटीं चीज़ें जो होती हैं, एक छोटासा हास्य, एक छोटासा स्मितहास्य, छोटासा स्माईल, (वो बहुत बड़ी होती हैं)। अपना खुद का बेटा या बेटी एक्झाम के लिए, इम्तहान के लिए जा रहे हैं, तो आजकल मैं देखता हूँ कि जो सेंटर्स पर आते हैं पॅरेन्ट्स उनका चेहरा ही सबसे ज्यादा दुखी और टेन्स होता है, बच्चे से भी दस गुना ज्यादा। तो बच्चा कौनसी हिम्मत लेकर एक्झाम के लिये जायेगा! हम भूल जाते हैं। छोटी चीज़ें छोटे छोटे बच्चें जब करते हैं, जैसे कि हमारा छोटा बच्चा होता है, तब पहली बार जब ‘माँ’ बोलता है, या ‘डॅड’ बोलता है, या ‘पापा’ बोलता है, ‘पिताजी’ बोलता है, ‘बाबुजी’ बोलता है, ‘बाबा’ बोलता है, ‘आई’ बोलता है, जो भी बोलता है, पहली बार सुनने के बाद कैसा लगता है? हम बार बार उसे बोलते हैं - ‘बोलो, बोलो’ करके, उसके बाद क्या? हम हमारे घर के लोगों की, हमारे दोस्तों की बात कितनी बार सुनते हैं? हम सुनने के लिए कभी तैयार ही नहीं होते। हाँ अभी डिस्कोर्स में जाना है, यहाँ प्रवचन मे आना है, तो उन्हें लगता है, ‘नहीं, यहाँ सुनना आवश्यक है’। वह भी कितनी बार (एक कान की तरफ़ इशारा करते हुए) यहाँ से घुसकर (दूसरे कान की तरफ़ इशारा करते हुए) यहाँ से बाहर चला जाता है; (सिर की तरफ़ इशारा करते हुए) इधर कुछ रहता नहीं; और अगर रहता है, तो भी मॅग्झिमम्‌ दो घंटे के लिए। लेकिन प्रवचन सुनने के बाद, कोई अच्छी बुक, किताब पढ़ने के बाद भी, हज़ारों बातें ध्यान में रखने की आवश्यकता नहीं होती। सिर्फ़ छोटी-छोटी जो बातें होती हैं जिंदगी में, वो सीखनी चाहिए।

देखिये, अभी बरसात आती है, तो साथ में छाता चाहिए या रेनकोट चाहिए; क्या यह बड़ी बात है? नहीं....छोटी बात है। आप लोग खुद को पूछिए, कितनी बार आप लोग हर रोज छाता लेकर निकलते हैं बरसात के दिनों में? (सोचेंगे) ‘यहाँ बम्बई में कहाँ बरसात आती है? वो लोग कुछ भी बोलते हैं - “आज नहीं आनेवाली है” (बोले, तो) जरूर आयेगी, “आनेवाली है” (बोले, तो) तो नहीं आयेगी’; और जो लोग छाता लेकर निकलते हैं, उनमें से कितने लोग छाता लेकर वापस घर जाते हैं? मैं खुद की बात बताता हूँ, मेरे पास सिर्फ़ एक ही छाता एक रात तक मेरे साथ रहा, बाकी दूसरे किसी एक भी छाते ने, एक भी umbrella ने रात नहीं देखी। सुबह लेकर गया, शाम को भूल आया (ऐसा मेरे छाते का होता था)। मेरा खुद का example दे रहा हूँ। जो चीज़ हमें ज़रूरी है उस मौसम के लिए, उसे भी हम लोग भूल जाते हैं। अभी गॉगल्स पहनते हैं, तो वो तो स्टाईल के लिए पहने जाते हैं ज़्यादा। धूप से ज़्यादा किस के लिए पहने जाते हैं? स्टाईल के लिए, स्टाईल मारने के लिए। उम्र....उम्र का कोई हिसाब नहीं। जिस उम्र में तुम चाहते हो, उस उम्र में कर सकते हो। वो गॉगल्स जो हैं, उसकी ज़रूरत होती है, उसे हम भूल जाते हैं। रेबॅन का खरीदेंगे, और महँगा खरीदेंगे। लेकिन कितनी बार वो तुम्हारे साथ रहता है, ये ध्यान में रखिये। पूछिए....नहीं रहता, घर में पड़ा रहता है। रामनाम की नोटबुक खरीदते हैं, एकदम एक डझन लेकर जायेंगे, बारह लेकर जायेंगे - ‘अरे, आठ दिन में एक खत्म हो जायेगी!’ एक साल में एक खत्म नहीं हो पाती। छोटी छोटी चीज़ करनी हैं....एक पन्ना लिखना है। मंत्रगजर १६ माला करनी हैं....ठीक है; एक माला करने के लिए तो आरंभ कर दो, वो भी नहीं होता। बहुत सारे लोग १६ माला कर रहे हैं मुझे मालूम है, लाखों लोग आज १६ माला कर रहे हैं, डेफीनेट्ली। लेकिन हमें याद कितना रहता हैं, छोटी-छोटी चीज़ो के बारे में हम कितने concerned होते हैं, ये बहुत important होता है, महत्त्वपूर्ण होता है लाईफ में।

छोटी सी बात मैं बोलता हूँ - हम लोग जब छोटे थे, उस समय गलती से भी हमारा पैर किसी चीज़ को लग गया, तो माँ और पिताजी बोलते थे - ‘इसे प्रणाम करना’। आजकल कितने लोग करते हैं? मेरी उम्र के भी कितने लोग करते हैं? पैर लग गया, लग गया। इतना ही नहीं, सुबह उठने के बाद जमीन को पदस्पर्श करने से पहले उसे प्रणाम किया जाता था, कितने लोग आज उठने के बाद भूमाता को प्रणाम करते हैं? १, २, ३, ४, ५ अरे, ४० से ज़्यादा हाथ उपर आए, व्हेरी गुड। लेकिन इतनी बड़ी भीड़ में ४०-५० लोग यानी बहुत कम हो गये। सीधी-सी बात है ना - आप को श्लोक नहीं आता है, ठीक है। कौनसा श्लोक है याद है? ‘समुद्रवसने देवि, पर्वतस्तन मंडले। विष्णुपत्नी नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे।’ समीरदादा के ब्लॉक पर से मैं भेज दूँगा। सुबह पैर रखने के समय हम मानते हैं कि ‘ये भूदेवी विष्णु की शक्ति है’। यह हमारी संस्कृती हैं। श्लोक नहीं आता है, कोई प्रॉब्लेम नहीं। सिर्फ पहला एक प्रणाम कर लें, बस्स्। ‘भूमाता, तुझे प्रणाम’ - इतना काफ़ी है। फिर देखिए, हमारी दिन की शुरूआत कैसी होती है - एकदम मंगलपूर्ण होती है, पवित्रता से भरी हुई होती है, अंबज्ञता से भरी हुई होती है।

आजकल तो ‘सॉरी’ और ‘थँक्स’ हम लोग ऐसे बहा देते हैं कि उसका कोई अर्थ नहीं रह गया। ना उस ‘थँक्स’ को अर्थ होता है, ना ‘सॉरी’ से अर्थ होता है। हमारे दिल में कितनी छोटी छोटी बातें अधुरी रह गयी हैं, ज़रा सोचकर देखिये। ख़ासकर जिनके माँ और पिताजी आज नहीं हैं इस दुनिया में, वो सोचकर देखिये, कितनी बातें अधूरी रह गयी हैं, जो मैं कहना चाहता था, जो मैं कहना चाहती थी मेरी माँ के लिए, मेरी माँ के प्रति, मेरे पिताजी के प्रति और कह नहीं सका; और जिनके माँ-बाप (जीवित) हैं, वो भी सोचकर देखिये - कितनी बातें ऐसी हैं, जो मैं कहना चाहता हूँ कह नहीं सका, आज तो कहूँगा। बच्चों को कितनी बाते कहना चाहते थे, नहीं कह सके। अरे, ५०० पेजेस की नोटबुक भी कम पड़ सकेगी इतनी बाते मन में रह जाती हैं। गलती नहीं है आप लोगों की, ऐसा होता है। लेकिन हमें सावधान रहना पड़ेगा थोड़ासा तो जिंदगी में। सिर्फ बड़ी बड़ी चीज़ें, बड़े बड़े वाक्य, बडे बडे डायलॉग्स, बडे बडे कार्य कुछ नहीं कर सकते; छोटी-सी छोटी चीजों से सब कुछ होता है।

देखिये, आपने कभी भी, कहीं इतिहास पढ़ा होगा शायद स्कूल में। स्कूल में गये, तभी history पढ़ी होगी, याद कितनी है? मालूम नहीं, राईट? कौनसी भी क्रान्ति जो है, या लड़ाई है, क्या वह अकस्मात ज़ोर से शुरू होती है और खत्म होती है? नहीं। छोटी-छोटी चीज़ों से शुरू होती है, (फिर वह) क्रान्ति हो, उत्क्रान्ति हो या लड़ाई हो, युद्ध हो, कुछ भी हो; और जब खत्म होती है, उसके बाद में भी छोटी-छोटी चीज़ें घटती ही रहती हैं।

अभी देखिए, लोकमान्य तिलक ने स्वातंत्र्ययुद्ध का आरंभ कर दिया यहाँ, तो उनके जो new-papers थे, क्या वे पूरे India में पढ़े जाते थे पहले? नहीं, थोड़े लोग ही पढ़ते थे। बाद में ज़्यादा लोग पढ़ने लगे। कितने साल गए, तीस साल के बाद लोग उन्हें पूरे देश में पहचानने लगे। गांधीजी, साऊथ अफ़्रिका से यहाँ आये; जिस दिन आए उसी दिन से सारा भारत क्या उनके पीछे नाचने लगा? नहीं। शिवाजी महाराज....कितनी उम्र में शुरुआत की उन्होंने? सोलह साल में, छोटी उम्र थी। जो किला हाथ में ले लिया पहला, तोरणा ना? वो कितना बड़ा किला था? छोटा था। कितने लोग थे साथ में? हजार लोग थे साथ में? सौ थे? नहीं। कितने थे? ज़्यादा से ज़्यादा पचीस लोग होंगे, ज़्यादा से ज़्यादा।

तो इससे हम जान सकते हैं, छोटी सी शुरुआत होती है हर बड़े कार्य में। तो हमारे जीवन में क्यों न हम छोटी-छोटी सी चीज़ों से शुरुआत करें? कहीं ना कहीं तो शुरुआत करनी ही पड़ती है। हम लोग हमेशा किसी बड़ी चीज़ की राह देखते रहते हैं।

एक लड़की को प्रपोज करना है समझो एक लड़के को। तो कितना टेन्शन रहता है दस दिन तक। कब पुछूँ? कैसे पुछूँ ? red rose लेकर जाऊँ, या yellow rose लेकर जाऊँ या white rose लेकर जाऊँ? कॉलेज में बोलूँ कि कॉलेज के बाहर बोलूँ? डेट पर बाहर बुलाऊँ ताकि मार नहीं मिलेँ चप्पल की, गाली ना मिलें। इतने सारे टेन्शन्स्‌ रहते हैं।

इन्टरव्ह्यू के लिए जाना है। इन्टरव्ह्यू के लिए जब हम लोग जाते हैं, अंदर कोई इन्टरव्ह्यू ले रहे हैं। हम लोग अंदर जाने के बाद क्या करते हैं? मैंने बहुत बार, खुद बहुत इन्टरव्ह्यू लिए हैं इसीलिए बोल सकता हूँ - 90 out of 100 कोई भी आकर तुम्हें wish नहीं करता। इतना घबराया हुआ रहता है हमेशा कि wish करना ही भूल जाता है - Good Morning, Good Evening नहीं, होता ही नहीं। कुछ लोग तो इतने घबराए हुए होते हैं, इतने भूल जाते हैं, सीधा आकर बैठ जाते हैं कुर्सी पर। यह गलत है। ये छोटी चीज़ें भी बहुत मायने रखती हैं।

लेकिन हम लोग बड़ी चीज़ों के पीछे ही दौड़ते हैं, छोटी चीज़ों को भूलते रहते हैं, इसीलिए बड़ी चीज़े हमारे हाथों में कभी आती ही नहीं, राईट?

इसीलिए इस भारतीय संस्कृति ने, जिसमें हमेशा आदिमाता का पूजन सर्वश्रेष्ठ माना है, उसमें सबसे आसान बात क्या रखी है? जगदंबा की उपासना के लिए सबसे छोटीसी चीज़ कौन सी है हमारी संस्कृति में? जब हम प्रसन्नोत्सव करते थे, तब मैंने बताया था - यहीं पर, इसी platform पर। सबसे आसान, सबसे छोटी चीज़ माँ जगदंबा के पूजन के लिए कौनसी होती है? - खुद की माता का स्मरण करके प्रणाम करना। Simple. ‘मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्य देवो भव।’ इतनी छोटी सी बात। हमें किसी मंदिर में जाने की आवश्यकता नहीं।

हम लोग गणपती की स्टोरी तो सुनते हैं। गणपती और स्कंद कार्तिकेय दोनों में कुछ लड़ाई हो गई। तो कौन अच्छा, यह decide करने के लिए हमेशा की तरह देवर्षि नारद आते हैं। उन्होंने कहा कि जो पहले विश्वप्रदक्षिणा करके, पृथ्वीप्रदक्षिणा करके वापस आ जाएगा पहला, He is right....वह best. स्कंद कार्तिकेय तो भोलाभाला स्वभाव का था। गणपती तो बहुत बुद्धिमान। Obviously he is smart, smartest. तो बेचारा स्कंद निकला पूरी पृथ्वी की प्रदक्षिणा करने के लिए। गणपती ने क्या किया? अपनी माँ की प्रदक्षिणा की। क्योंकि माँ क्या होती है? माँ विश्वरूपिणी होती है। हर एक माँ, जगदंबा का अंश लेकर ही रहती है, ये ध्यान में रखिए। हाँ अभी कलीयुग है। कलीयुग में ऐसा हो सकता है शायद, कुछ-कुछ माँएँ गलत हो सकती हैं। फिर भी मातृत्व की संकल्पना जो है, वह गलत नहीं हो सकती। राईट, इसीलिए माँ का नाम ही क्या है? अंबा - अंब - अंबा यानी ‘मेरी माँ’। ‘अंबा’ का मतलब सिर्फ ‘माँ’ नहीं है, ‘मेरी माँ’ है। ‘अंबा’ शब्द का संस्कृत में अर्थ है - ‘मेरी माँ’। तो हमें सिर्फ उसे ‘अंबा’ नाम से पुकारना है। आप माँ के साथ हो, आपके संबंध-तालुक्कात आपकी माँ के साथ अच्छे हो या ना हो, कुछ भी मायने नहीं रखता। पहले एक शब्द सिर्फ मुँह से निकल जाए कि ‘जय जगदंब’ ....‘जय जगदंब’ या ‘अंबज्ञ’; सुबह उठने के बाद ‘अंबज्ञ’ बोला, रात को सोने के समय ‘अंबज्ञ’ बोला, बस्स्। माँ का बहुत बड़ा पूजन हो जाता है अपनेआप। so, हमारे संस्कृति में हमेशा इस जगदंबा की पूजा करने के लिए, भक्ति के लिए बहुत सीधे-साधे उपाय - तरीके बताए हुए हैं। और इसके बिना कुछ हो नहीं सकता। माँ जगदंबा के पूजन के बिना, प्रार्थना बिना, स्तुति बिना, भक्ति बिना कुछ नहीं हो सकता। ये सारी की सारी जो ऊर्जाएँ हैं इस विश्व में, सारी की सारी जो शक्तियाँ हैं, वो शक्तियाँ कहाँ से आती हैं? सिर्फ इस महाशक्ति से, मूलशक्ति से, मूल प्रकृति से, मूल माया से। हमें जो भी ऊर्जा चाहिए, जो भी शक्ति चाहिए छोटे काम से लेकर बड़े काम तक, वो कहाँ से आनेवाली है? माँ जगदंबा से ही आनेवाली है। only and only and only, सिर्फ माँ जगदंबा से ही। तो हमारे लिए सबसे आसान क्या है? हम गुरुक्षेत्रम्‌मंत्र कहें, राईट। वह माँ का सुमिरन है, स्मरण है। ‘रामा रामा आत्मारामा’ पूरा का पूरा मंत्र ही, पूरा मंत्रगजर ही directly माँ का स्वरूप है। ‘रामा रामा आत्नारामा, त्रिविक्रमा सद्‌गुरु समर्था। सद्‌गुरु समर्था त्रिविक्रमा आत्मारामा रामा रामा।’ पूरा मंत्र ही क्या है? माँ जगदंबा का स्वरूप है। आसान हो गया काम?

So, हमारे मन में हमेशा जो रहता है कि मैं कुछ बड़ा नहीं कर सकता, मैं बड़ी पूजा नहीं कर सकता, मैं बड़ा पूजन नहीं कर सकता, मैं बड़ा हवन नहीं कर सकता, मैं बड़ी तपश्चर्या नहीं कर सकता, मैं बड़ी तीर्थयात्रा नहीं कर सकता, बड़ी समाजसेवा नहीं कर सकता; वो सब गलत है। हर एक का अपना-अपना कार्य अलग होता है और हर एक इन्सान का एक महत्त्व होता है इस विश्वरचना में। तो कभी भी खुद को कम ना समझो। ‘मैं कुछ भी काम का नहीं, मैंने क्या किया मेरी जिंदगी में? कुछ भी नहीं किया।’ ऐसा कभी नहीं सोचना, कभी भी नहीं। क्योंकि, माँ जगदंबा ने हमें जन्म दिया है, स्वयंभगवान ने हमें जन्म दिया है, इस पृथ्वी पर लाया है, वसुंधरा पर लाया है, तो वो हमसे कुछ ना कुछ ज़रूर करवा रहे हैं। तो कभी भी खुद को कम नहीं मानना। अगर तुम उस ‘एक’ को अपना पिता मानते हो, तो समझना कि मेरी जिंदगी कभी भी अधूरी नहीं रह सकती। मेरा जीवन कभी भी व्यर्थ नहीं हो सकता।

लेकिन आवश्यक बात क्या है? बड़ी-बड़ी चीज़ों के पीछे भागना बंद कर दो। हमारा ध्येय बड़ा होना चाहिए, जरूर होना चाहिए। इसके लिए हमें क्या करना आवश्यक है? छोटी-छोटी चीज़ें शुरू करना आवश्यक रहता है।

तो आज से हम छोटी-छोटी चीज़ों पर ध्यान देंगे? [यस्स्]
नक्की? [नक्की],
नक्की? [नक्की],
नक्की? [नक्की]
॥ हरि: ॐ ॥ श्रीराम ॥ अंबज्ञ॥ 

॥नाथसंविध्‌॥ नाथसंविध्‌॥ नाथसंविध्‌॥

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माझ्या लाडक्या बाळांनो, तुम्हाला एक गोष्ट मनापासून सांगतो, अगदी मनापासून की खूप जणांच्या मनामध्ये मी गेले काही दिवस बघतोय की ‘मी हे करू शकत नाही, मी ते करू शकत नाही, मला हे जमलं नाही, मला ते जमलं नाही’ ही खंत आहे. अरे, आज एवढे दिवस तुम्ही माझ्याकडे येताहात. तुमचं माझ्यावर एवढं प्रेम आहे, मी बघतोय; तर तुम्हाला ही खंत का असावी? हा मूर्खपणा करू नका. तुमचं जीवन मी कधीच अर्धवट राहू देणार नाही. ओ.के.? तुमच्या जीवनाशी मी निगडीत आहे. नक्कीच सांगतो, निगडीत आहे. अप्रत्यक्षपणॆ नाही, प्रत्यक्षपणे directly. जे माझे आहेत, मी त्यांचा आहे. त्यामुळे it is my promise, हे माझं promise आहे की ज्याचं माझ्यावर प्रेम आहे, त्याचं जीवन मी कधीच व्यर्थ तर जाऊ देणारच नाही, पण अर्धवटही राहू देणार नाही. १०८%!

जय जगदंब जय दुर्गे। जय जगदंब जय दुर्गे। जय जगदंब जय दुर्गे।

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