सदगुरु श्री अनिरुद्ध पितृवचन

( गुरुवार, दिनांक २९ अगस्त २०१९)

हरि ॐ, श्रीराम, अंबज्ञ.
नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌.

श्रावण का महीना अभी खत्म होनेवाला है और आगे क्या है? [गणपति] गणपति। हर साल के अनुसार सभी मेरे बच्चों को, मेरे दोस्तों को, मेरे मित्रों को, मेरे आप्तजनों को गणपति के लिए अपने घर आने के लिये निमंत्रण....बड़े प्यार से।

इस श्रावण महिने में जो शिवपरिवार पूजन शुरू हो गया, बहुत लोगों ने देखा, बहुत लोगों ने किया। यह गणपति जो है, वह शिव का पुत्र है। सभी जानते है....जानते है ना? [हाँ] कौनसा भी पंथ हो - शैव हो, वैष्णव हो, शाक्त हो; लेकिन किसी भी मंगलविधी का आरंभ कहाँ से होता है? गणपति की पूजा से, गणपति के पूजन से।

देखिये, पहले से, शिव को मानने वाले शैव, विष्णु को मानने वाले वैष्णव, उनके बीच में जब झगड़े चल रहे थे, तभी भी दोनो पंथों को समान रूप से गणपति मान्य था। इसका मतलब क्या है? शिव और विष्णु के बीच में कोई लफड़ा नहीं था, कोई झगड़ा नहीं था, उनके मूल भक्तों के बीच में भी कोई प्रॉब्लेम नहीं था, उनके परिवारों के बीच में भी कोई प्रॉब्लेम नहीं था। फिर प्रॉब्लेम कहाँ था?

बहुत साल पहले की बात है....हज़ार-डेढ़ हज़ार साल पहले इस भारत में ऐसा होता रहता था, क्यों? मेरा भगवान बड़ा या तेरा भगवान बड़ा....राईट? आज भी चलती है यही बात। मैं साईबाबा को मानता हूँ....तो मेरा साईबाबा बड़ा, मैं स्वामीसमर्थ को मानता हूँ....तो मेरे स्वामीसमर्थ बड़े, क्यों? हम कौन होते हैं ऐसी तुलना करने वाले? नहीं करनी चाहिए। यह तुलना सामान्य लोग नहीं करते; जिनको विशेष interest होता है, ख़ास interest होता है, कुछ पाने में, कुछ हासिल करने के लिए - कुछ ताकत, सत्ता, पॉवर (हासिल करने के लिए)....All power-centric people.... जो सत्ता-केंद्रित लोग होते हैं, उनके मन में जो भी चीज़ है....(फिर वह) धार्मिक हो, राजकीय हो, सामाजिक हो, वैयक्तिक हो, उस चीज़ का फ़ायदा उठाने की चाहत मन में रखते हैं; और जनता कैसी होती है? Common mass कैसा होता है? सोचता नहीं है ज्यादा, जो दिखता है, उसी पर भरोसा कर लेता है। और जो दिखता है, वैसा होता नहीं, यह बात बहुत बार हम लोग भूल जाते हैं। जो सुनते हैं, बस्स् वही सही मान बैठते हैं। अब थोड़े थोड़े सुधर रहे हैं सोशल मीड़िया के कारण; लेकिन बी़स-तीस साल पहले तो (ऐसी परिस्थिति थी कि) जो भी छपकर आयेगा, वही सही है, वही सत्य है, बस्स् ऐसा ही हम लोग मानते थे। लेकिन कितना लिखा जा सकता है? पूरा भारत देश, या समझो हम लोग मुंबई में रह रहे हैं, तो महाराष्ट्र की पूरी न्यूज़ क्या एक न्यूज़पेपर में आ सकती है? नहीं, it is imposssible!

वैसे ही, जो पॉलिटीकल लीडर्स होंगे, उनकी सभाओं में पहले तो बहुत सारे लोग जमा होते थे, उनका भाषण सुनने के लिए। १९८२- ८३ तक तो मुंबई में ऐसा प्रॉब्लेम था कि कहीं ना कहीं तो मोर्चा निकल रहा है, कहीं तो तालाबंदी चालू है, नहीं तो कहीं स्ट्राईक चालू है। क्या हो गया? बहुत बड़ा ज़ोर का झटका लगा। सारीं Unions बहुत पॉवरफूल होती थीं और सारे कामगार, वर्कर जो होते थे, (वे यही सोचते थे कि) बस्स् हमारी Union हमारे लिए कुछ करने वाली है। मुझे Politics में कोई interest नहीं। लेकिन १९८२ में क्या हो गया? १९७९-८०-८१-८२ में मुंबई में सबसे ज़्यादा अहमियत किसकी थी? मिल्स की, कॉटन मिल्स की; वहाँ ही स्ट्राईक हो गया। उसका क्या हो गया आगे चलकर? बिखर गये लोग, टूट गये। कितने लोगों ने आत्महत्याएँ कीं, खुदकुशियाँ कीं, कितने लोग रास्ते पर आ गये! और बहुत कुछ हो गया। पूरी तीन पीढ़ियाँ बर्बाद हो गयीं। क्यों? एक स्ट्राईक के कारण। किसी ने भी यह नहीं सोचा कि हम जो कर रहे हैं, हमें जो बोला जा रहा है, वह सही है या गलत।

और गणपति जो है, वह ‘विघ्नहर्ता’ क्यो माना जाता है? क्योंकि वह हमारे विचारों का अधिष्ठाता होता है। हमारे विचार (अगर) गलत हैं, तो उन्हे दूर करने के लिए; हमारे मन में जो विचार हैं, वो आगे चलके (अगर) गलत चीज़ दे सकते हैं, तो उन्हे रोखने के लिये; हम (अगर) कुछ गलत करनेवाले हैं, तो उसे रोखने के लिए हमारे शरीर में मूलाधार चक्र होता है। जो सप्तचक्र होते हैं, उनमे सबसे पहला चक्र ‘मूलाधार चक्र’ है और उस मूलाधार चक्र का स्वामी कौन है? गणपति है, गणेश है। आहार, विहार, आचार, विचार.... आचार यानी आचरण, क्रिया, जो हमारे हाथ से होती है; उनका स्वामी यह गणपति है। हमारे मन में जो विचार आते हैं या विचार ड़ाले जाते हैं, कोई हमें बहकाने की कोशीश करते हैं, उन सब पर नियंत्रण भगवान के किस रूप का रहता है? ‘गणेश’ रूप का।

देखिए कौनसी भी क्रिया के आरंभ में क्या होता है? विचार होता है। विचार के बिना कुछ भी कार्य नहीं हो सकता। गलत हो या सही, (मग़र) एक विचार (ज़रूर) होता है हर एक कार्य के आरंभ में; और उसी आरंभस्थान को मंगलमय बनाने का कार्य कौन करता है? गणपति करता है। और शुरुआत ही अच्छे विचारों से हो, अच्छी बुद्धि से हो, पूरी तैयारी के साथ हो, पूरे सक्षम बनकर हो, तो विघ्न आ ही नहीं सकता; और आ भी गया, तो उसका निवारण मनुष्य खुदबखुद कर सकता है, यह ताकत होती है मंगलमूर्ति गणेश की। इसीलिए सिर्फ शुभकार्य में नहीं, किसी भी कार्य में, हमारे हररोज़ के जीवन में भी गणपति का अनन्यसाधारण महत्त्व रहा है, राईट? इसीलिए हर मंगलविधि के आरंभ में सभी जगह, सभी प्रदेशों में, भारत के लोग जहाँ-जहाँ हैं, वहाँ प्रथम-पूजा का मान किसका होता है? प्रथम-पूजा का मान गणपति का होता है।

बहुत सारे लोग आजकल आकर दादा को पूछते है, ‘दादा! हमारे घर में गणपति ला रहे थे लोग, (लेकिन) आजकल मियाँ-बीवी दोनो भी नौकरी पर जाते हैं, बच्चें स्कूल जाते हैं, घर बंद करके जाना पड़ता है।’ जाईए, कोई प्रॉब्लेम नहीं। लेकिन जो तुम्हारी नित्य उपासना होगी उसके साथ, जो आरती करनी है, जो प्रसाद चढ़ाना है, वो चढ़ाने को भूलना नहीं। घर बंद करके जाने में कोई दिक्कत नहीं है। गणपति ऐसा नहीं सोचेगा कि मुझे कैदखाने में रखा है।

कुछ लोग बोलते हैं, ‘दादा, हम गणपति नहीं ला सकते। क्या करना है?’ उनकी जो परिस्थिति होगी, वह (अगर) सही होगी, तो वह सोचकर दादा जवाब दे देते हैं। (वैसे ही,) पहले दस दिन के गणपति बहुत होते थे, बाद में वो पाँच दिन के हो गये, अभी वो डेढ़ दिन के हो गये, राईट? कोई प्रॉब्लेम नहीं, भावना महत्त्वपूर्ण होती है, भाव महत्त्वपूर्ण होता है। लेकिन गणपति घर में हो या नहीं, गणपति के ये जो दस दिन हैं - कभी-कभी दस दिन के ग्यारह, कभी नौ दिन होते हैं - उन दिनों में हमें क्या करना चाहिए, यह सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। एक तो हम गणपति का दर्शन कर सकते हैं, गणपति का पूजन कर सकते है, गणपतिजी को जो अर्पण करना चाहते हैं, वह अर्पण कर सकते हैं। इसके साथ और क्या कर सकते है?

मैंने बहुत साल पहले भी बताया था यहाँ, कि ‘उस’के साथ बातें करनी चाहिए। Treat Him like your own guest and (such a) guest, which is not somebody unknown to you. ऐसा अतिथी नहीं, जो बस थोंपा गया हो आप पर। इसीलिए गणपति को क्या मानने की परंपरा है? जो घर का प्रमुख पुरुष है, वह मानता है कि मेरी बहन का बेटा घर आ रहा है, (अर्थात्) मामा के घर भाँजा आ रहा है, राईट? इसीलिए गणपति के तीसरे या चौथे दिन कौन आती है? गणपति की माँ लायी जाती है - ‘गौरी’ यानी पार्वतीजी। और गणपति के विसर्जन के दिन महाराज शिव आ जाते है, अपनी wife को, अपनी पत्नी और अपने बेटे को वापस ले जाने के लिए। तो हमें क्या करना चाहिये? हम आरती तो धुमधाम से करते हैं, प्रसाद बहुत महँगा लाते हैं, लेकिन कितने पल हम गणपति के सामने बैठते हैं? उसके साथ क्या बातें करते हैं? यहाँ हम स्वस्तिक्षेमसंवाद करते हैं ना, वैसा ही हम वहाँ उसके, गणपति के सामने बैठकर क्यों नहीं कर सकते हमारे घर में? इतना ही नहीं, प्रसाद - भोग जो चढ़ाया, अर्पण किया है, उसके बाद में, क्या कभी हम लोग बोलते हैं उसे, ‘कैसा लगा खाना आपको, हाथ से बनाया मैंने?’ या हाथ से न भी बनाया हो, बाहर से भी लाया हो, तो भी चलेगा। ‘(जो खाना) लाया है, वो कैसा लगा आपको? और ज्यादा चाहिए क्या?’

हमें एक चीज़ याद रखनी चाहिए कि जब भी किसी भी मूर्ति की प्राणप्रतिष्ठा होती है, इसका मतलब क्या है? That is a personality which is alive, वो जिवंत मूर्ति बन जाती है। प्राणप्रतिष्ठा यानी जिवंत होती है मूर्ति। एक बार उसका प्रथम पूजन हो गया पहले दिन, यानी क्या मानना चाहिए? यह अब मूर्ति नहीं रही, यह क्या है? खुदबखुद गणपति हैं। यह भावना चौबीस घंटे हमारे मन में रहनी चाहिए। अगर चौबीस घंटे नहीं रही समझो - काम में उलझ गए, बहुत सारे लोग आये - कम से कम चौबीस मिनट तो रह सकती है, उसके सामने बैठकर। क्या हम करते हैं?

(मानो हम) हमारे घर में गणपति नहीं (लाते) है। हमारे घर में छोटीसी मूर्ति तो होगी, बहुत सारे लोगों के घर में होती है। कम से कम गणपति की तस्वीर तो होगी। उसके सामने बैठ नहीं सकते? उसे हाथ में लेकर बात नहीं कर सकते? कर सकते हैं। इन दिनों का ही महत्त्व क्यों? इन दस दिनों में ही क्यों? वह तो ‘मातृवात्सल्यविन्दानम्‌’ में आ गया है कि इसका महत्त्व क्या है। मैं बार-बार नहीं दोहरानेवाला। लेकिन उसका एक और अलग महत्त्व - माहात्म्य है। यह खुद जो है, इन दस दिनों का माहात्म्य, वह साक्षात् दत्तात्रेय की माता यानी शिवजी की भी माता - माता अनसूया का आशीर्वाद है।

जब लोग उनके आश्रम में पहुँचने लगे कि ‘विचार अच्छे नहीं होते इसीलिए आचार अच्छे नहीं होते। गलतियाँ बहोत होती हैं, संकट उसके कारण बहोत ज्यादा आते हैं।’ तब माँ अनसूया ने पहली बार गणपति की मूर्ती काकभृशुंडी ऋषि को प्रदान की। ‘भृशुंडी’ यानी जिसके ‘भृ’ से ‘शुंडी’ यानी शुंड निकलती है ऐसे। वे प्रखर रामभक्त थे और गणेशभक्त थे। उन्होंने गणपति की ध्यान-धारणा इतनी की सालों तक, हजारों सालों तक; कि उनका चेहरा गणपति जैसा ही बन गया। इसीलिए उनका नाम ही ‘भृशुंडी’ हो गया।

तब भृशुंडी ऋषी तपश्चर्या पूर्ण होने के बाद अनसूया माता के पास पहुँचे। तो अनसूया माँ ने, जो जगदंबा है साक्षात्, उन्होंने पूछा, ‘क्या चाहिए तुझे?’ ‘मुझे मेरे लिए कुछ नहीं चाहिए। जो लोग तुम्हारे पास आते हैं माँ, उनके लिए जो आप करना चाहती हैं वो पहले मैं करना चाहता हूँ। लोगों में जाकर उसका प्रचार और प्रसार करना चाहता हूँ।’ तो माँ ने कहा, ‘तुझे क्या लगता है?’ उसने कहा, ‘माँ, मैं कुछ नहीं चाहता, बस इतना ही चाहता हूँ। बाकी जो तुम बोलोगी, वैसा ही होगा।’ अनसूयाजी ने कहा कि, ‘चलो बेटे, यहाँ बैठ जाओ।’ और आईने के सामने उन्हें बिठा दिया। आईने के सामने बैठने के बाद माँ अनसूया ने पूछा, ‘बेटा क्या देख रहे हो?’ ‘मेरी खुद की प्रतिमा देख रहा हूँ।’ अनसूया ने कहा, ‘जब तक तुम्हें तुम्हारी प्रतिमा दिख रही है, तब तक देखते रहना। जिस पल तुम्हें दूसरा कुछ दिखेगा, तब सिर्फ ‘हरि: ॐ’ कहना।’ भृशुंडी ऋषि बैठ गए आईने के सामने। ऐसे इक्कीस (२१) साल निकल गए। कितने? इक्कीस साल! ‘इक्कीस’ नंबर गणपति के साथ जुड़ा हुआ है। बहुत कारण हैं उसके, उसमें एक यह भी है।

इक्कीस साल जब पूरे हो रहे थे, तब हुए उन्हें लगा कि मेरे सामने साक्षात् भगवान गणेश हैं। और भगवान गणेश मुझसे कह रहे हैं, ‘क्या मैं आ सकता हूँ?’ क्या पूछ रहे हैं? ‘क्या मैं आ सकता हूँ?’ काकभृशुंडी के मुँह से अपनेआप शब्द निकल गए, ‘जरूर आइए, घर आप का ही है।’ उनका घर तो छोटा आश्रम था। ‘जरूर आ जाइए।’ उन्होंने माँ अनसूया की तरफ देखा, फिरसे आईने के तरफ देखा....गणपतिजी अंतर्धान हो गए थे, अदृश्य हो गए थे।

तब माँ अनसूया ने कहा, ‘क्या कहा, क्या हो गया?’ सब बात बता दी। ‘तो जाओ, क्या सोच रहे हो? आश्रम में भागकर जाओ। ‘वह’ तुम्हारे घर में आया है।’ काकभृशुंडी ऋषि अपने आश्रम में आ गए। नजदीक ही था। देखा, तो उनके घर में एक मंचक पर गणपति की मूर्ति विराजमान थी....साक्षात्। उन्होंने कहा, ‘हे भगवन्‌, आप मेरे आश्रम में तो अनसूयाजी के आशीर्वाद के कारण आ गए। बकी सारे लोगों के लिए क्या?’ तो उन्होंने कहा, ‘जो भी कोई मेरी प्रतिमा का भी पूजन करेगा, उसके घर में मैं साक्षात् रहूँगा।’ और जिस दिन अनसूया के आश्रम में, आईने में गणपति जी का यह दर्शन हुआ, वह दिन था - ‘भाद्रपद शुद्ध चतुर्थी’। और इसीलिए प्रथा ऐसी हुई, इक्कीस दिन तक - उन्होंने इक्कीस साल की थी - इक्कीस दिन तक गणपति की आराधना करनी चाहिए। इक्कीस दिन, पहले महापूजन चलता था हर एक घर में । बाद में लोगों को इक्कीस दिन....became difficult, so it became 11 days, then became 5 days, then became one & half (1.5) days.

कोई प्रॉब्लेम नहीं। यह कथा जो है, यह हमें क्या बताती है? गणपतिजी खुद अपने सर्वश्रेष्ठ भक्त के घर में आये थे। उन्होंने वरदान दिया था, (जो) मूर्ति की प्रतिष्ठापना करेगा उसके घर में उतने दिन रहूँगा। तो हमें जानना चाहिए कि जब इस भाद्रपद चतुर्थी के दिन हम लोग गणपति घर लाते हैं, गणपति जब घर आते हैं, तो वह स्वयं गणेश होता है, मूर्ति नहीं होती।

So, हॅप्पी होम में जब आप आते हो, गणपति को देखते हो, राईट? तो गणपति को देखो भाई, प्यार से देखो। बापू किधर बैठा है, वो पहले नहीं (देखना), नहीं चलेगा। मैं तुम्हारा प्यार जानता हूँ। लेकिन पहले क्या देखना चाहिए? गणपति को देखना चाहिए। वही उचित है। जो सही है, वो सही है और जो गलत है, वो गलत है, राईट?

और दूसरी बात बोलना चाहता हूँ, आप लोगों को ऐसा लगता है कि (खुद की ओर निर्देश करते हुए) यह जो साढ़े तीन हाथों का, छ: फूट exact.... छ: फूट हाईट है मेरी....तो छ: फूट का जो देह है, वही देखें हम लोग, तो बस ठीक हो गया। (दर्शन के समय) यहाँ से जब (आप) लोग....मेरे बच्चे गुजरते हैं, तो ‘बापू, बापू, बापू,....’ यहाँ से (लेफ़्ट साईड से) पुकारना शुरू होता है, उधर (राईट साईड) जाने तक। एक बार सब लोग कोशिश करके देखो। तुम्हारी जो नेक है, गर्दन है, उसे ऐसे पूरे ९० डिग्री में घुमाओ। (लेफ्ट साईड) ऐसा देखो, आधा घंटा वैसे ही रहो। बाद में इस बाजू (राईट साईड) करो, आधा घंटा वैसे ही रहो। बाद में एक घंटे तक, यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ मूंडी हिलाते रहो। क्या हो जाएगा?

लेकिन बापू के सामने से जाते समय किसी को फिक्र नहीं बापू की। वहाँ (राईट साईड एन्ड तक) जाकर पुकारेंगे ‘बापू, बापू, बापू..........’ और जब तक बापू देखता नहीं है, हम लोग हिलेंगे नहीं। कोई ऐसा सोचता नहीं, उसकी (बापू की) गर्दन में भी दर्द होता होगा।

मैं आपका प्यार जानता हूँ, लेकिन दिखावे का प्यार और सही प्यार इसमें अंतर क्या होता है, ये भी मैं जानता हूँ। तुम्हारे ज़ोर से नाम पुकारने से कुछ फर्क नहीं पड़ता मुझे। ना कभी पड़ा है, ना पड़ेगा। आपको लगता है, ‘बापू जब तक हमें देखता नहीं, तब तक ठीक नहीं।’ गलत! यानी आप मुझे जानते ही नहीं या मुझे मानते ही नहीं या मुझमें प्यार रखते ही नहीं। मुझे ‘ऐसे’ देखने की कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन हम गलत जगह देखते रहते हैं।

So....जान लो, बापू आपको देखें, यह ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है, या आप बापू को देखें, यह ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है। क्या महत्त्वपूर्ण है? [हम देखें] हाँऽऽऽ! तो यह विश्वास होना चाहिए कि बापू मुझे देख रहा है, तो ढूँढ़ने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यहाँ (ये साईड) से चिल्लाने की, वहाँ (उस साईड) तक चिल्लाते रहने की आपको आवश्यकता नहीं रहेगी।

जब गणपति के दिन जब आओगे, जब मुझे मिलना है, मैं जरूर मिलने को आ जाऊँगा....इस रूप में भी....प्रत्यक्ष ऐसे के ऐसे! आता ही हूँ ना विंडो में? लेकिन गणपति के लिए आते हो तो गणपति का ही दर्शन करना है, ओ.के.?
नक्की? [नक्की], नक्की? [नक्की], नक्की? [नक्की]

और आपके घर में गणपति आता हो या ना आता हो, इन दस दिनों में एक बार तो कम से कम चौबीस मिनट गणपति की प्रतिमा के सामने ज़रूर बैठोगे और उससे बातें करोगे।
शुअर? [शुअर], नक्की? [नक्की], नक्की? [नक्की], नक्की? [नक्की]

॥ हरि: ॐ॥ श्रीराम॥ अंबज्ञ॥
नाथसंविध्‌॥ नाथसंविध्‌॥ नाथसंविध्‌॥

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