ताकत मंत्रगजर में है – सद्गुरु श्री अनिरुद्ध – ०६ जून २०१९

सदगुरु श्री अनिरुद्ध पितृवचन

( गुरुवार, दिनांक ०६ जून २०१९)

हरि ॐ, श्रीराम, अंबज्ञ.
नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌, नाथसंविध्‌.

हररोज़ किसीने कभी कॅलक्युलेट किया है, काऊंट किया है - हम कितने शब्दों का उच्चारण करते हैं, कितने शब्द बोलते हैं? कभी सोचा है? और कितने शब्द सुनते हैं, कितने सारे लोगों की बाते सुनते हैं? नहीं ना, एक दिन काऊंट करके देखो। हर एक घंटे के बाद, एक घंटे में कितना बोला? Obviously पति और पत्नी में शायद व्यस्त प्रमाण हो सकता है। I am not blaming anyone, ok? कौन ज्यादा बोलता है - पति या पत्नी? अरे, जोर से बोलो। [पत्नी] यहाँ से भी (महिलाओं के यहाँ से भी) वही जवाब आया so they are very honest, agreed. बात सही है। लेकिन जो भी हो, हम लोग बातें तो सुनते रहते हैं। लेकिन सुनी हुई बातें जो होती हैं, उनपर भरोसा कितना करना है, यह सबसे महत्वपूर्ण बात होती है। क्योंकि बहुत बार ऐसा होता है कि जो बात सुनते हैं, उस पर यकिन कर लेते हैं, विश्वास कर लेते हैं तुरंत। नहीं....हमारे पास भगवान ने दिमाग दिया हुआ है, बुद्धी दी हुई है, उसका इस्तेमाल करना चाहिये। मैं हर बार लोगो में देखता हूँ कि बस्स् बात सुनी और मान ली। ऐसा क्यों होता है कभी सोचा है? कितनी बार हमारे खुद के बारे में ऐसा हुआ है सोचो। सुनी हुई बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है, उन पर गौर करना भी ठीक बात है, लेकिन वे सही हैं कि नहीं, इसका निर्णय हमें खुद करना पड़ता है और बहुत बार ऐसा होता है कि सुनी हुई बातें गलत हो सकती हैं, लेकिन हर एक का अपना अपना परसेप्शन होता है, राईट?

मैंने यहीं पर हरिगुरुग्राम में कम से कम दस-बारह बार कहा है की सेन्टेन्स कितने सारे ढंगों में बोला जा सकता है। एक वाक्य हमें कोई बताता है - समझो एक इंसान है, वह आकर अपने दूसरे दोस्त को बोल रहा है, अपने ‘सतिश’ नाम के एक दोस्त के बारे में - ‘सतिश पिक्चर देखने गया था’। अभी यह सेन्टेन्स देखिये बहुत सारे ढंग से कहा जा सकता है।
(सेन्टेन्स के अलग अलग शब्दों पर ज़ोर देते हुए बापु बोलते हैं)
सतिश पिक्चर देखने गया था।
सतिश पिक्चर देखने गया था?
सतिश ‘पिक्चर देखने’ गया था।
सतिश ‘पिक्चर देखने’ गया था?
सतिश पिक्चर देखने ‘गया था’,
‘सतिश’ पिक्चर देखने गया था!

देखिए, कितने अर्थ हैं? हमें सिर्फ शब्द बताये जाते हैं, उनके पीछे जो अर्थ होता है, वह सुननेवाले शायद जानता नही हैं या हेतुपूर्वक, कुछ हेतु से हमें वह भाव नहीं बताता।

बहुत बार क्या होता है? एक शब्द, एक पूरा वाक्य कहा जाता है, दो वाक्य कहे जाते हैं, उसमें दो-चार शब्द ऍड किये जाते हैं अपनेआप। एक गेम खेलके देखिये। बहुत बार हम लोग खेलते हैं - ४० लोग बैंठे हैं राऊंड करके और एक सिर्फ पाँच लाईन वाली स्टोरी....पहले आदमी से, नंबर एक आदमी से शुरू करना सिर्फ़ कान में बताना है; और जब अंत में आते हैं चालीसवें इन्सान तक, तब स्टोरी पूरी की पूरी बदल चुकी होती है, वैसा ही होता है।

लेकिन हम लोग हमेशा हमारा जो मत है, ओपिनीअन है, वह सुनी हुई बातों पर निर्धारित करते हैं। इतना ही नहीं, देखी हुई बातो पर भी निर्भर करते हैं। सिर्फ दूर से कुछ देखा....जैसे एक लड़का एक लड़की से बात कर रहा है....बस्स् खतम हो गया। कुछ कारण होगा, कुछ अलग बात भी हो सकती है।

वैसे ही, किसी के हाथ में हमने यकायक ज़्यादा पैसे देखे, तो बस्स्, (हम सोचने लगते हैं) - ‘मैंने खुद देखा है, उसके हाथ में एक लाख रूपये थे। उसे तो सिर्फ ५,००० रूपये मिलते है महीने में; (निश्चित ही) कहाँ से चुराये होंगे।’ अरे भाई, देखे हैं उसके पीछे का रहस्य तुम जानते हो? नहीं। बस्स् विश्वास कर लिया कि चोर ही होगा।

वैसे ही, कोई लड़की ज़्यादा बनठनके आती है, तो बस्स् (हम सोचने लगते हैं) - ‘यह चालू ही होगी।’ अरे भाई, कपड़ों पर क्या निर्भर करता है? देखिये, हिन्दी पिक्चर्स में हम लोग देखते थे, ‘प्राण’ नाम का एक व्हिलन था। वह जब आता था परदे पर, औरतें गालियाँ देने लगती थीं - ‘आ गया मुआ’ करके। लेकिन वो सबसे सच्चा इन्सान था फिल्म इंडस्ट्री में। यानी जो दिखता है, उस पर कुछ भी नहीं निर्भर करता हैं। ज़िन्दगी में भी वैसा ही होता है। लेकिन ये एक कारण है कि जो हम सुनते हैं, जो देखते हैं, वोही सही मान बैठते हैं। देखने से खुछ नही होता। समझो एक औरत एक बच्चे को ठोक रही है ज़ोर से, खींच-खींचकर घर से बाहर धकेल रही है। हमें लगता है कि ‘कैसी माँ है!’ लेकिन माँ क्या कर रही है? बच्चा स्कूल नहीं जाना चाहता, उसे ठोक रही है, मार रही है, बेसिकली ड़ाँट रही है। ड़ाँट रही है, तो किसके लिये? उसके भले के लिये। लेकिन सिर्फ दूर से देखने से हमें यह पता नहीं चलेगा। इसीलिये जो चीज़ हम सुनते हैं या देखते हैं, वो भी ९०% टाईम गलत हो सकता है, ये ध्यान में रखिये।
मैं एक बड़ी अजब कहानी सुनाता हूँ, मैंने खुद की आँखों से देखी हुई है। मैं एक शादी में गया था, महाराष्ट्रीयन पद्धति की शादी थी। मंगलाक्षता स्तोत्र चालू था। वधु खड़ी थी हाथों में हार लिये हुये, पतिदेव भी खड़े थे। बीच में परदा पकड़ा हुआ था (जिसे ‘अन्तरपाट’ कहते हैं)। बाद में ‘शुभमंगल सावधान’ पाँच बार हो गया, तो उसकी जो बहेन और वे औरतें खड़ी थीं पीछे वधु के, उन्होंने कहा कि ‘(वर के गले में) हार डाल दे’। वह हार डालने को आगे हो रही थी कि उसका पैर फिसल गया और हार पास में ही खड़े होनेवाले पुरोहित के गले में गया। वो पुरोहित बूढ़ा था ७० साल का। अभी देखिये - मैंने आँखो से देखा, सब लोगों ने देखा, उसने वरमाला किसे पहनाई? उस बूढ़े पुरोहित को। इसका मतलब क्या है? Was she in love with him? Did she want to marry him? क्या उसको उसके (पुरोहित के) साथ शादी करनी थी? नहीं। यह तो जोक है, लेकिन उससे हम लोग जान तो सकते हैं, सीख तो सकते हैं कि जो देखते हैं, उसके पीछे कुछ अलग हो सकता है। लेकिन नहीं....हम हमारा दिमाग़ इस्तेमाल ही नहीं करना चाहते। दिमाग इस्तमाल कहाँ करते हैं? सिर्फ स्पेक्युलेशन्स के लिए, तर्क करने के लिए कि ‘ऐसा हो सकता है, वैसा हो सकता है।’

जैसे वाईफ चलती है हज़बंड के साथ मॉल में, उसकी एक आँख हज़बंड पर होती है कि वह कहाँ देख रहा है। एक बाजू तो विंडो शॉपिंग चल रही है, दूसरी ओर वह देख रही है कि हज़बंड कहाँ देख रहा है। हसबंड भी एक आँख से पत्नी को देख रहा है, एक आँख से दूसरी जगह देखता रहता है। हाँ....(जेन्ट्स् की ओर इशारा करते हुए) यहाँ से ज़ोर से हँसी आ रही है, राईट? तो भाई देखने से कुछ नहीं है, समझने से सब कुछ होता है। सुनने या देखने से कुछ नहीं होता, समझने से होता है। हमें समझ लेना चाहिये कि बात क्या है; and 99 out of 100 times क्या होता है? हम लोग सिर्फ जो सुनते हैं, जो देखते हैं, उसी पर भरोसा करते हैं, उसे सही मान लेते हैं और उसके हिसाब से हम हमारा जीवन, या हमारे जीवन में जो कृति करनी है, जो reaction देनी है, जो प्रतिसाद देना है, जो प्रतिक्रिया देनी है, वो देते रहते हैं और जीवन में सब कुछ गलत होता रहता है।
बहुत सारे लोग (यह कहनेवाले) मुझे मिलते हैं कि ‘बापू, क्या हमारा नसीब है मालूम नहीं हमें। हमेशा हमें गलत लोग ही ज़्यादा मिलते हैं, बुरे लोग ही ज्यादा मिलते हैं, अच्छे लोग मिलते ही नहीं हैं।’ मैं बड़े आत्मविश्वास के साथ कह सकता हूँ कि, मुझे जन्म से लेकर आज तक अच्छे लोग बहोत ज़्यादा तादाद में मिले (तालियाँ)। अगर एक बुरा इन्सान मिला मुझे, तो मुझे सौ करोड़ अच्छे लोग मिले....yes, that's the proportion.
क्यों? मेरे पास कुछ जादू है? नहीं। मैंने (तो ग्रन्थराज में) लिखकर दिया है, ‘मेरे पास कोई जादू नहीं है’। सिर्फ एक बात है, जो मेरी माँ ने मुझे बतायी है, जो मैं हमेशा ध्यान में रखता हूँ कि, ‘जो सुनता हूँ, वह सिर्फ सुनता हूँ; जो देखता हूँ, सिर्फ देखता हूँ; लेकिन जानने की कोशिश करता हूँ और समझने की कोशिश करता हूँ।’
यहाँ एक - दो छोटीसी स्टोरीज़् बताता हूँ। दो जगह मैं गया था, (दोनों जगह) दुख की घटनाएँ थी। दोनों जगह पति की मृत्यु हो गई थी जवान उम्र में। बीस-पचीस साल पहले की बात है। पहली जगह गया, मेरे कन्सल्टिंग के सामने ही बिल्डिंग थी। वहाँ जो गुज़र गया था, वह सिर्फ अठ्ठाईस साल का लड़का था। उसकी शादी होकर सिर्फ आठ महीने हुए थे। उसकी wife प्रेग्नंट थी। सब लोग रो रहे थे, लेकिन वह लड़की बिलकुल रो नहीं रही थी। वह सिर्फ बैठी हुई थी। एक आँसू भी नहीं आ रहा था। ऊपर से उसने बीच में उठकर खाना भी खा लिया। बीच में दो घंटा सो भी गई। उसकी ननंद आनेवाली थी गाँव से, उसके लिए रुके थे।

so, लोग उसे ताने देने लगे, कोसने लगे कि ‘कैसी औरत है? कोई दुख नहीं है। पति का मृतदेह पड़ा हुआ है, जवान उम्र में चला गया और बीवी कैसा बर्ताव कर रही है?’ लेकिन मैं जानता था, कुछ अलग बात हो सकती है। मैं दूसरे दिन उसके पास गया, उसके पास बैठा था। वह थी, उसकी सास थी, उसकी माँ थी। उसकी सास ने मुझे बताया, ‘ये बहुत शूर है मेरी बहु। बहुत अच्छी है। यह मेरा एक ही बेटा था। जैसे ही मेरी बहु को यह न्यूज मिली, उसने मुझसे कहा, ‘माँजी, आज से मैं तुम्हारा बेटा हूँ और मेरे पेट में, मेरी कोक में जो बच्चा पल रहा है, उसके लिए मैं कुछ भी करूँगी। मेरा दुख मैंने फूँक दिया है, थूक दिया है, फेंक दिया है। अब मुझे सिर्फ आप के पोते की फ़िक्र है, बस्स्। पोते या पोती की, जो भी बच्चा है पेट में।’ इसीलिए वह खा रही थी, सो रही थी; किसके लिए? उस बच्चे के लिए! और सारे लोग जो सिर्फ तमाशा देखने के लिए आए हुए थे, सिर्फ मुँह दिखाने के लिए आए हुए थे, वो उसे criticized कर रहे थे। अरे, तुम्हारे बाप का क्या जाता है? लेकिन ऐसे लोगों की बातों में ही सब लोग आते हैं। 

दूसरी एक दूर की जगह मैं गया था। वहाँ वह औरत इतना सर पटक-पटककर रो रही थी और उसकी बहनें, उसकी देवरानियाँ, जेठानियाँ, पड़ोस की औरतें, सब उसे पीछे खींच रही थी। मुझे लगा कि बहुत ज़्यादा ही रो रही है। हो सकता है भाई, दुख है किसका। मैं क्यों किसी की नींदा करूँ? लेकिन छ: महीने के बाद पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया, पकड़ लिया। उसने ही मर्डर किया था पति का! ये मनगढ़न्त कहानी नहीं है, सच्ची कहानी है।

So, देखने से क्या समझे तुम लोग? लेकिन हमारा कदम सबसे आगे रहता है, दूसरे की आलोचना करने के लिए, दूसरे की निंदा करने के लिए, उसके दोष दिखाने के लिए। और हमें सब जगह गलत ही दिखता है। जिसे सब जगह गलत दिखता है, वो इन्सान सबसे ज़्यादा गलत होता है, यह ध्यान में रखिए। जिस इन्सान को सब जगह गलत दिखायी देता है, वह इन्सान सबसे ज़्यादा गलत होता है, क्योंकि उसके पास समझ नहीं है, अकल नहीं है। हिन्दी में एक कहावत है - ‘काला अक्षर भैंस बराबर।’ यानी क्या? यानी पूरा का पूरा अनपढ़। काला अक्षर है या भैंस का चित्र है, उसके लिए सब समान है। हम So-called educated लोगों की, शिक्षित लोगों की स्थिति भी ऐसी होती है। पढ़ते तो बहुत हैं, डिग्रीयाँ तो बहुत बड़ी-बड़ी होती है। आज नेट के ज़माने में तो ऐसा लगता है, सारा जग हमारी मुठ्ठी में है, सारा नॉलेज हमारी मुठ्ठी में है। ऐसा नहीं होता। हमें समझने की कोशिश करनी चाहिए। इन्सान को, इन्सानों को, रिश्तों को परखने की जरूरत होती है। सिर्फ सुनने से और सिर्फ देखने से परख नहीं सकते। उसके लिए क्या आवश्यकता होती है? दिल और दिमाग साथ-साथ होने चाहिए। सिर्फ दिमाग से decision लोगे, तो वह भी गलत होगा, सिर्फ दिल से लोगे, तो भी गलत होगा। जब दिल और दिमाग दोनों साथ-साथ काम करते हैं, यानी भावना और बुद्धि साथ-साथ काम करते हैं तभी हमारी परख सही होती है।
और जो मंत्रगजर हम लोग करते हैं, उससे क्या होता है? हमारा हृदय और हमारा मग़ज साथ-साथ काम करना सीखते हैं, अपनेआप। उस मंत्रगजर का effect ऐसा है, जो हर एक पर होता रहता है। अगर हम गलती नहीं करना चाहते हैं जिंदगी में, या गलती हो भी जाए समझो, तो सुधारना चाहते हैं, तो this is the best way. ये अच्छा तरीका है, अच्छा मार्ग है हमारे लिए। 

मैं बोल रहा हूँ, ‘सिर्फ करते रहो।’ मैंने ऐसा कभी नहीं कहा, ‘एकाग्र चित्त से करो’। प्राधान्य वही रहना चाहिए। हाथ से जो काम करते हो, करते रहो। आप पिक्चर देख रहे हो, तब भी मंत्रगजर कर सकते हो। ‘बापू, ये क्या बात हुई?’ हाँ, यही सही बात है। तब भी करो, वो count भी count करना correct है। यह ‘मैं’ कह रहा हूँ, आझादी है आप लोगों को। समझे? (तालियाँ)

क्योंकि ताकत तुम लोगों में नहीं है। ताकत उस मंत्रगजर में है; क्योंकि वो मंत्रगजर जिसने किया है, जिसने दिया है, उसमें इतनी भारी ताकत है, ओ.के.?
So, किस जगह कर रहा हूँ? कब कर रहा हूँ? अभी सिरीज देख रहा हूँ, तो count करना गलत होगा? ऐसा मत सोचो, ओ.के.? [ओ.के.] agree? [agree]
So, दिल और दिमाग दोनों साथ में रखना चाहते हो [yes Sir] o.k.? [o.k.]
So, आज से मेरे बच्चें गलत decision नहीं लेंगे? [नहीं लेंगे]
नक्की? [नक्की), नक्की? [नक्की), नक्की? [नक्की)।
और लिया तो? [आप हो ना],
मैं हूँ ना? यह मैं अलग ढंग से कह रहा हूँ - ‘मैं हूँ!’
और मैं जैसा हूँ, वैसा ही हूँ। मुझे चाहे आप ‘अच्छे दिलवाला’ कहें, ‘बड़े मृदु स्वभाव का’ कहें, या ‘बहुत बुरा’ कहें, मुझे गालियाँ दे दें। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता, ना आपकी स्तुति से, ना आपकी निंदा से। मैं जो हूँ वैसे ही रहूँगा, बदलनेवाला बिलकुल नहीं, कभी भी नहीं।
कोशिश करना चाहते हो, कोशिश आजमाना चाहते हो, तो आज्माईश के लिए welcome. लेकिन मैं बदलनेवाला नहीं हूँ, ओ.के.?
So, आज से हम लोग जो सुनेंगे, जो देखेंगे, उस पर विचार करेंगे, समझने की कोशिश करेंगे और साथ-साथ मंत्रगजर करते रहेंगे।

Love you all [Love you dad]

॥ हरि: ॐ ॥ श्रीराम॥ अंबज्ञ॥ नाथसंविध्‌॥

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